25 December 2014

मनरेगा का अर्थशास्त्र

Atif Rabbani
आतिफ रब्बानी 
समयांतर 

[मनरेगा क्रोनी कैपिटलिज्म का पहला निशाना क्यों बना? क्योंकि यह देश के सबसे गरीब तबके को फायदा पहुँचाने वाली योजना थी। "मनरेगा का अर्थशास्त्र" में आतिफ रब्बानी ने खूब समझाया है कि मनरेगा क्यों जरूरी है। समयांतर में प्रकाशित इस लेख को स्वाधीन पर पुनर्प्रकाशित करना जरूरी लगा। जरूर पढ़िए...]  

अर्थशास्त्र यानी इकोनॉमिक्स—जिसे उन्नीसवीं सदी के मशहूर विक्टोरियाई इतिहासकार टॉमस कार्लाइल ने ‘डिसमल साइन्स’ की संज्ञा दी थी—भी अजीब और कन्फ्यूजिंग विषय है! अल्फ्रेड मार्शल से लेकर ग्रेगरी मैनकीव तक, एडमंड फ़ेल्प्स से लेकर जोन रॉबिंसन तक, मिल्टन फ्रिडमैन से लेकर पॉल सैमुएल्सन तक—जितने अर्थशास्त्री उतने सिद्धांत। अमेरिकी अर्थशास्त्री एडगर फीडलर ने लिखा था—“आप किसी विषय पर पांच अर्थशास्त्रीयों से बात कीजिए, आपको पांच अलग-अलग जवाब मिलेंगे। और अगर उनमें कोई हार्वर्ड का पढ़ा हो तो वह ख़ुद दो तरह के जवाब देगा। यानी पांच अर्थशास्त्री, छह जवाब।” लगभग ऐसा ही दृश्य आज भारत के अर्थशास्त्रियों के बीच दिखता है। जहां महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के भविष्य को लेकर देश के 28 प्रमुख अर्थशास्त्री—जिनमें ज्यां द्रेज़, ऋतिका खेरा, अभिजीत सेन, जयंती घोष और अश्विनी देशपांडे आदि प्रमुख हैं—ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है जिसमे इसके ख़त्म किए जाने का ख़दशा ज़ाहिर किया गया और पत्र में इस योजना को आगे भी जारी रखने की गुज़ारिश की गयी। तो वहीं ‘सरकारी’ अर्थशास्त्रियों का एक समूह—जिसमें अरविंद सुब्रमण्यन, जगदीश भगवती और अरविंद पनगढ़िया आदि हैं—का मानना है कि नरेगा के दायरे को सीमित कर दिया जाना चाहिए और, अगर हो सके तो, अंततः इसको समाप्त भी किया जा सकता है। मतलब, योजना को लेकर विभिन्न अर्थशास्त्रियों के बीच भारी मतांतर है। बहरहाल, जैसा कि लियोनेल रोबिंसन ने कहा है कि अर्थशास्त्र, सीमित संसाधनों और उनके प्रयोग के मध्य अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन है। लिहाज़ा, मनरेगा के बजट (संसाधन) और इसके कार्यान्वयन (प्रयोग) के आईने में इसकी पड़ताल करते हैं कि क्या योजना भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रही है? क्या देश में वित्तीय संसाधनों का इतना टोटा है कि इस योजना को अब और आगे जारी नहीं रखा जा सकता? क्या इस योजना को यूं ही समेट दिया जाना चाहिए?

क्या है मनरेगा
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम 2005 की शुरुआत 2 फरवरी, 2006 को ग्रामीण क्षेत्रों में की गई। इसका मक़सद ग्रामीण क्षेत्रों के परिवारों की आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसके तहत हर परिवार के एक वयस्क सदस्य को एक साल में कम से कम 100 दिनों का रोज़गार दिए जाने की गारंटी है। इसका एक लक्ष्य टिकाऊ परिसंपत्तियों का सृजन करना भी है। पहले चरण में इसे देश के 200 सबसे पिछड़े ज़िलों में लागू किया गया। दूसरे चरण में वर्ष 2007-08 में इसमें 130 और ज़िलों को शामिल किया गया, जबकि एक अप्रैल 2008 से इसका विस्तार सभी शेष ग्रामीण ज़िलों तक कर दिया गया। इसका आधार अधिकार और मांग को बनाया गया, जिसकी वजह से यह बहुत महत्वपूर्ण हो गया। इसके तहत समयबद्ध रोजगार गारंटी और 15 दिनों के भीतर मज़दूरी का भुगतान करना आदि शामिल है। इसका 90 फीसदी खर्च केंद्र सरकार वहन करती है, इसलिए राज्य सरकारों को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे रोज़गार प्रदान करने में कोताही न बरतें। इसके अलावा इस बात पर भी ज़ोर दिया जाता है कि रोज़गार शारीरिक श्रम आधारित हो, जिसमें ठेकेदारों और मशीनों का कोई दखल न हो। इसमें महिलाओं की 33 फीसदी श्रम भागीदारी सुनिश्चित की गई है। श्रम मद में 40 फीसदी और सामग्री मद में 60 फीसदी खर्च किए जाने की अधिकतम सीमा तय की गई है। पहले इसका नाम नरेगा यानी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना था। बाद में इसका नाम बदल कर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना किया गया।
ग़ौरतलब है कि कृषि क्षेत्र में भारी मात्र में अधिशेष श्रम है। एक ओर जहां देश के जीडीपी में कृषि का योगदान 15 फीसदी से कम है वहीं कुल श्रमशक्ति का तकरीबन 50 फीसदी हिस्सा इससे जुड़ा हुआ है। जो लोग इस क्षेत्र से निकल भी गए हैं उनके लिए भी शहरी रोजगार क्षेत्र बहुत उत्साहित करने वाला नहीं है। इस कार्य शक्ति का 40 फीसदी स्वरोजगार वाला है जबकि अन्य 18 फीसदी अंशकालिक श्रमिक हैं। सरकारी क्षेत्र समेत समूचा संगठित क्षेत्र कुल कर्मचारियों के महज 7 फीसदी के लिए ही जिम्मेदार है। असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे लोग सामाजिक सुरक्षा के कवच से बाहर हैं—यह एक अलग कहानी है। आर्थिक वृद्धि ही नहीं, सामाजिक तानेबाने को बरकरार रखने के लिए ज़रूरी है कि किसी न किसी तरह से इस अधिशेष श्रम को उपयोगी बनाया जाय। निश्चित ही, ऐसी स्थिति में नरेगा एक कारगर नुस्ख़ा है।

मनरेगा पर गिरती गाज
केंद्र की मोदी सरकार मनरेगा का दायरा सिकोड़ना चाहती है। पूरे देश में चल रही इस योजना को मौजूदा सरकार महज जनजातीय या पिछड़े जिलों तक ही सीमित करना चाहती है। साथ ही, सरकार की योजना मनरेगा एक्ट में संशोधन कर इसमें वर्णित श्रम और सामग्री के मौजूदा अनुपात (60:40 से घटा कर 51:49) को बदलने की है। इस दिशा में, सरकार ने राज्यों से यह कहा है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष के शेष महीनों में वे मनरेगा पर अपना खर्च सीमित करें।
उल्लेखनीय है कि अधिकार आधारित इस योजना की मद में किया जाने वाला बजटीय आवंटन पिछले कई वर्षों से लगातार कम हो रहा है। वित्त वर्ष 2014-15 के लिए मनरेगा के मद में आवंटन महज 34,000 करोड़ रुपये का है, जो राज्यों द्वारा इस मद में मांगी गयी राशि से 45 प्रतिशत कम है (देखें तालिका-1)। जहां तक मनरेगा-जीडीपी अनुपात की बात है, वर्ष 2009-10 में देश की जीडीपी में मनरेगा के मद में हुए आवंटन का हिस्सा 0.87 प्रतिशत था, जो 2013-14 में घट कर 0.59 प्रतिशत हो गया। मनरेगा के अंतर्गत खर्च की गयी राशि का सालाना औसत 38 हजार करोड़ रुपये का रहा है, जबकि सालाना आवंटन औसतन 33 हजार करोड़ रुपये का हुआ है।
तालिका-1: नरेगा में व्यय की प्रवृत्ति
वर्ष कुल व्यय (करोड़ रु)
2009-10 37545
2010-11 39400
2011-12 37787
2012-13 39660
2013-14 38598
स्रोत: बजट दस्तावेज़ (विभिन्न वर्ष)
अगर सरकार मनरेगा को संकुचित करने के प्रस्तावित एजेंडे पर अमल-दर-आमद न करे तब भी मुद्रास्फीति के बढ़ने और आवंटित राशि की कमी के दोतरफा दबाव में मनरेगा का क्रियान्वयन लगातार बाधित होता रहा है। आवंटन में हो रही कमी को ध्यान में रखें, तो समझ में आता है कि सौ दिन की जगह क्यों अभी तक मनरेगा में गरीब ग्रामीण परिवारों को सालाना औसतन 50 दिन का भी रोजगार नहीं दिया जा सका। मनरेगा के अंतर्गत 2013-14 में कुल 10 करोड़ लोगों को रोजगार मिला। वहीं, अगर श्रम और सामाग्री पर खर्च की जानेवाली राशि का अनुपात बदला जाता है—60:40 से घटा कर 51:49 किया जाता है—तो मनरेगा के अंतर्गत रोजगार-सृजन की मौजूदा दर कायम रखने के लिए अतिरिक्त 20 हजार करोड़ रुपये की जरूरत पड़ेगी। चूंकि सरकार मनरेगा का बजट आवंटन बढ़ाने की जगह घटा रही है, तो इस का सीधा प्रभाव यह पड़ेगा कि मनरेगा के रोजगार सृजन की क्षमता में 40 प्रतिशत की कमी आयेगी। वहीं अगर श्रम-सामग्री अनुपात घटाने के साथ-साथ नरेगा को 200 पिछड़े जिलों तक महदूद किया जाता है तो ढाई करोड़ परिवार प्रभावित होंगे (तालिका-2)।
तालिका-2: 2013-14 के नरेगा आंकड़े
कुल नरेगा व्यय (श्रम+सामाग्री) (करोड़ रु.) 36228.7 
200 पिछड़े जिलों में कुल नरेगा व्यय (श्रम+सामाग्री) (करोड़ रु.) 16890.17
200 पिछड़े जिलों में श्रम के दिन (करोड़) 87.12
200 पिछड़े जिलों में परिवार को मिला रोजगार (करोड़) 2.014
श्रम-सामग्री अनुपात घटाने (51:49) पर 200 पिछड़े जिलों में श्रम के दिन (करोड़) 64.913
श्रम-सामग्री अनुपात घटाने पर 200 पिछड़े जिलों परिवार को मिला रोजगार (करोड़) 1.501
मनरेगा का दायरा सिकोड़ना पर प्रभावित परिवार (करोड़) 2.479
स्रोत: http://nrega.nic.in/

बेकार का तर्क
मनरेगा के विरोध में प्रबल तर्क है कि इस योजना से राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ रहा है और देश की अर्थ व्यवस्था इस स्थिति में नहीं कि वह इतना वित्तीय भर सहन कर सके। आइए, इस तर्क पर ग़ौर करते है कि क्या वास्तव में देश पास इतने वित्तीय संसाधन नहीं जिससे इस योजना को जारी रखा जा सके?
नव-उदारवादी और नव-शास्त्रीय अर्थशास्त्रियों को संख्याओं, अर्थमितीय, गणितीय और सांख्यिकीय पद्धतियां बहुत आकर्षित करती हैं। आमजन को सांख्यिकीय पद्धति के बारे में, गणितीय दांव पेंच और आंकड़ों की बाज़ीगरी के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं होती। ऐसा अमूमन समझा जाता है कि सांख्यिकीय आंकड़ों के ज़रिये पेश किया गया मफ़रूज़ा सैक्रोसैन्क्ट है—उसमे किसी भी प्रकार के बहस की कोई गुंजाइश नहीं। जबकि, हक़ीक़त इसके उलट होती है। वे सिर्फ़ सिक्के का एक रुख़ दिखाते हैं। ऐसा ही कुछ मामला मनरेगा के खिलाफ दिये जाने वाले तर्क का है। कुछ लोग तर्क देते हैं कि मनरेगा से राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है। यह सिर्फ़ सिक्के का एक रुख़ है। दूसरे रुख़ की तरफ भी ज़रा ग़ौर करिए, मनरेगा का बजट जीडीपी का केवल 0.3 प्रतिशत है, जबकि अमीर कंपनियों को कर में जो छूट मिलती है, वह जीडीपी का तीन प्रतिशत है। मतलब साफ है—जितना मनरेगा पे ख़र्च किया जा रहा है उससे दस गुना ज़्यादा पैसा तो अमीरों को छूट देने मे ख़र्च हो रहा है। नरेगा कोई बहुत महंगी योजना नहीं है। पिछले वित्त वर्ष में, नरेगा के लिए कुल व्यय मात्र 38,598 करोड़ रुपए था।
ऐसा नहीं कि भारत ही सिर्फ़ एक ऐसा देश है जो मनरेगा पर इतना व्यय कर रहा है। लातिन अमेरिकी देश भी अपने-अपने देशों में ग़रीबी उन्मूलन, रोज़गार सृजन समेत स्वास्थ्य के विभिन्न कार्यक्रमों में में अपने जीडीपी का अच्छा-ख़ासा हिस्सा व्यय कर रहे हैं। मसलन, ब्राज़ील ‘बॉल्सा फ़ेमेलिया’ और मेक्सिको ‘अपार्चुनिदादिस’—जो ग़रीबी उन्मूलन व रोज़गार सृजन से संबन्धित कार्यक्रम हैं—में क्रमशः 0.3 और 0.5 प्रतिशत व्यय कर रहे हैं (तालिका-3)।
तालिका-3: ग़रीबी उन्मूलन कार्यकर्मों की लागत
लागत-जीडीपी अनुपात
बॉल्सा फ़ेमेलिया (ब्राज़ील) 0.3
अपार्चुनिदादिस (मेक्सिको) 0.5
नरेगा (भारत) 0.3
स्रोत: वर्ल्ड बैंक (एमएफ़डीआर प्रिन्सिपल्स इन एक्शन: सोर्सबुक ऑन एमर्जिंग गुड प्रैक्टिसेस)
यहाँ तक कि भारत सामाजिक सेवाओं पर भी लैटिन अमेरिकी, उप-सहारा और पूर्व एशियाई देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम खर्च करता है। नवीनतम विश्व विकास संकेतक (वर्ल्ड डेव्लपमेंट इंडिकेटर्स) के अनुसार,  पूर्व एशियाई देश अपने जीडीपी का 7.20 प्रतिशत, लैटिन अमेरिकी देश 8.5 प्रतिशत और उप-सहारा अफ्रीकी देश 7 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य और शिक्षा में खर्च करते हैं। और जहां तक सामाजिक सुरक्षा का सवाल है, इस पैमाने पर भी भारत अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के मुक़ाबले काफी पीछे है। देश सकल घरेलू उत्पाद का सिर्फ 1.70 प्रतिशत हिस्सा सोश्ल सेक्युरिटी पर ख़र्च करता है जो कि निम्न-मध्यम आय वाले एशियाई देश (3.4 प्रतिशत) के मुक़ाबले आधी और चीन (5.4 प्रतिशत) से एक तिहाई से भी कम है। यह यूं ही नहीं है कि इन लातिनी अमेरिकी देशों का मानव विकास सूचकांक भारत से ज़्यादा है।

मनरेगा का 105 साल का ख़र्च
अब सवाल उठता है कि क्या वाक़ई भारत के पास इतने वित्तीय संसाधनों की कमी है कि नरेगा जैसी योजनाओं को आगे जारी रखा जा सकता? जवाब है, बिलकुल नहीं। भारत में कंपनियों को तो इतनी छूट दी जा रही है जिससे मनरेगा का 1 नहीं 105 साल का ख़र्च निकाल सकता है।
मशहूर लेखक और वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ ने अपने अध्ययन में खुलासा किया कि सरकार ने पिछले नौ सालों में कंपनियों को 365 खरब रुपए की टैक्स छूट दी है। इसका एक बड़ा हिस्सा तो हीरे और सोने जैसी चीज़ों पर टैक्स छूट में दिया गया। साईनाथ का कहना है कि सरकार अगर ये रक़म टैक्स छूट में नहीं देती तो इससे लंबे समय तक मनरेगा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली का ख़र्च उठाया जा सकता था। इस साल के बजट के दस्तावेज़ों के मुताबिक़ हमने 2013-14 में ज़रूरतमंद कॉर्पोरेट और अमीरों को 5.32 लाख करोड़ रूपए दे दिए। इस 5.32 लाख करोड़ रूपए से 105 साल तक मनरेगा की योजना बड़े आराम के साथ चलायी जा सकती है।
नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन और ज्यां द्रेज़ ने भी अपनी किताब एन अनसर्टेन ग्लोरी: इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शन्स में इस विसंगति (एनॉमली) की तरफ़ इशारा किया है कि भारत का सब्सिडी ढांचा कितना पक्षपातपूर्ण है। जहां पैसे की ज़रूरत वहाँ तो मितव्यययिता से काम चलाया जा रहा है जबकि, गैरज़रूरी क्षेत्रों में बिलादरेग़ पैसे ख़र्च किए जा रहे हैं। कमी संसाधनों की नहीं, प्राथमिकताओं में है।
अफसोस की बात है कि सरकार संसाधनों की कमी का रोना तो रोती है लेकिन सरकारी आय बढ़ाने पर चर्चा बिलकुल महीन करती। इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई पुस्तक कैपिटल इन द ट्वेंटी फ़र्स्ट सेंचुरी के लेखक अर्थशास्त्री  थॉमस पिकेटी और नैन्सी कियान की शोध रिपोर्ट ‘इनकम इनएक्वालिटी एंड प्रोग्रेसिव इंकम टैक्सेशन इन चाइना एंड इंडिया, 1986-2015’ के अनुसार, 1986 से 2008 के बीच चीन में कर देने वाली जनसंख्या 0.1 से बढ़कर 20 प्रतिशत तक पहुंच गई, जबकि इस दौरान भारत मे यह दो से तीन प्रतिशत के बीच अटकी हुई है।

एक फ़र्सूदा तजवीज़
मनरेगा विरोध में पेश-पेश नव-उदारवादी/नव-शास्त्रीय अर्थशास्त्रियों का ख़ेमा अमेरिकी नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. एडमंड फेल्प्स के उस व्यक्तव्य से प्रभावित है जिसमें उन्होने कहा था कि बेरोजगारी भत्ता और रोज़गार सृजन व गारंटी जैसे कार्यक्रमों के बजाय रोजगार सबसिडी देनी चाहिए। इससे बड़े उद्यमों के लिए श्रमिकों को रोजगार देना सस्ता हो जाएगा और कॉमर्शियल रोजगार में भी वृद्धि होगी। दी गई रकम की आंशिक वसूली बढ़ी हुई कॉमर्शियल गतिविधि से हो जाएगी। श्रम सस्ता होने के कारण उद्यमों की लागत कम आएगी, वे उत्पादन ज्यादा करेंगे और टैक्स ज्यादा अदा करेंगे। हो सकता है कि यह तर्क अमेरिका के संदर्भ में सही हो, लेकिन जहां तक भारत का प्रश्न है यहाँ तो ऐसा होने से रहा है। कौन नहीं जानता कि पिछले दो दशकों में बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों पर सरकार ने पैसे पानी की तरह लुटाए हैं—करों में छूट, सबसिडी, कौड़ी के भाव ज़मीनों का देना सहित वे तमाम तरीके हैं जिसके ज़रिये बड़े औद्योगिक घरानों को लाभान्वित किया गया है। मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात—संगठित रोज़गार में वृद्धि के बजाए ह्रास हुआ है।
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएस) के 68 वें राउंड के आंकड़ों तो कम से कम यही दिखाते हैं। इन आंकड़ों के अनुसार जून, 2010 से जून, 2012 के बीच बेरोजगारी में वृद्धि हुई है। पिछले दो साल के दौरान देश में बेरोजगारी 10.2 फीसदी की दर से बढ़ी है। इन आंकड़ों के मुताबिक़ जनवरी, 2012 में देश में पूर्ण बेरोजगारों की संख्या 1.08 करोड़ थी, जबकि दो साल पहले यह आंकड़ा 98 लाख था। इन आंकड़े के अलावा कई सरकारी एवं गैरसरकारी सर्वेक्षणों के आंकड़े भी बहुत बड़ी संख्या में बेरोजगारी की बात कह रहे हैं।
इससे पूर्व एनएसएस के 66 वें राउंड के अनुसार, वर्ष 2004-05 और 2009-10 के बीच रोज़गार में सालाना 0.8 प्रतिशत की ही बढ़ोत्तरी हुई जबकि जनसंख्या की वृद्धि दर 1.5 प्रतिशत प्रति वर्ष थी। जनसंख्या वृद्धि दर और रोज़गार दर की इस असंगति से बहुत कम ही लोगों को नियमित क्षेत्र में रोजगार मिलता है बाक़ी लोग असंगठित क्षेत्र का हिस्सा बन जाते है। इस तरह साल-दर-साल ‘बेरोज़गारों की रिज़र्व फ़ौज’ की तादाद में भारी इज़ाफ़ा हो रहा है। अब यह कैसे मान लिया जाये कि औद्योगिक घराने अपने लाभ बढ़ाने के बजाए अधिक रोज़गार देकर अपने मुनाफ़े की हवस में कमी करेंगे। घोड़ा घास से दोस्ती कर लेगा तो खाएगा क्या! बक़ौल पॉल क्रुगमैन—जो नोबल इनामयाफ़्ता मशहूर अर्थशास्त्री हैं—मुनाफ़े की एक दिक्कत यह है कि इससे मुनाफ़े की हवस में और ज्यादा आग लग जाती है। अस्तु, रोजगार सब्सिडी से रोज़गार में बढ़ोत्तरी हो न हो लेकिन उद्योगपतियों की ज़रूर पौ बारह होगी।

मनरेगा का एक पहलू यह भी
यह याद करना समीचीन होगा कि, 21 वीं सदी के शुरुवाती वर्षों में जब केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार थी, और बीजेपी सरकार ने 'भारत उदय' (इंडिया शाइनिंग) का भ्रमजाल पूरे मनोयोग से फैलाया था। आर्थिक वृद्धि का गुणगान किया जा रहा था। उस दौरान अगर कुछ चमक (शाइन) रहा था तो पूँजीपतियों और औद्योगिक घरानों की क़िस्मत का तारा चमक रहा था। खेतिहर मजदूर का उदय तो बिलकुल नहीं हो रहा था क्यूंकी इन वर्षों के दौरान खेतिहर मजदूरों की वास्तविक मजदूरी में प्रति वर्ष का स्तर सिर्फ 0.1 प्रतिशत ही था। लेकिन अगर वर्ष 2005-06 से 2010-11 तक की बात करें तो इस दौरान, कुछ हद तक, बेहतर बातें हुईं। इस दौरान सभी ग्रामीण श्रमिकों बशमूल गैर-कृषि अकुशल मजदूरों (मनरेगा श्रमिकों) की वास्तविक मजदूरी में इज़ाफ़ा हुआ। ख़ास बात तो यह है कि इस दौरान, महिलाओं की वास्तविक मज़दूरी में वृद्धि की रफ़्तार पुरुषों की तुलना में ज़्यादा रही। बेशक, अर्थमितीय दृष्टि से ग्रामीण मजदूरी वृद्धि की इस दर को सिर्फ मनरेगा से मंसूब नहीं कर सकते। लेकिन यह खेतिहर मजदूरों की मज़दूरी और मनरेगा के रिश्ते को दिखाता है।
मनरेगा महज़ रोज़गार सृजन का कार्यक्रम नहीं है। इसके मिलने वाले विभिन्न सामाजिक-आर्थिक लाभों के विभिन्न आयाम हैं। मनरेगा का एक ‘डोमिनो प्रभाव’ यह भी है कि इससे महि‍लाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुधारने में मदद मिली है। उल्लेखनीय है कि 1995 में बीजिंग में आयोजित चतुर्थ विश्व महिला सम्मेलन में यूनीफेम की तत्कालीन निदेशक नॉलिन हॉयज़र ने कहा था कि दुनिया के एक अरब तीस करोड़ लोग नितांत ग़रीब हैं। इनमें महिलाओं कि संख्या 70 फ़ीसदी से भी ज़्यादा है। जबकि औरतें शब-ओ-रोज़ के मश्ग़ले और दुनिया के काम काज के घंटों में दो-तिहाई समय काम करती हैं। लेकिन दुनिया की आमदनी में उसे सिर्फ़ दसवाँ हिस्सा मिलता है। मनरेगा ने हाशिये पर खड़ी औरतों को रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराया है—भले यह मौक़े कम हों। दूसरी ओर, जाने-माने अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक का मानना है कि नरेगा के जरिये न सिर्फ ग्रामीण गरीबों को भयावह गरीबी से बाहर निकलने में मदद मिली, बल्कि इसी कार्यक्रम की बदौलत वैश्विक आर्थिक संकट के समय भारत पर इसका उस हद तक प्रभाव नहीं पड़ा।

अंत में
मनरेगा के आर्थिक और सामाजिक फ़ायदे को वर्ल्ड बैंक ने भी स्वीकार किया है। विश्व बैंक ने 2009 में अपनी विश्व विकास रिपोर्ट (वर्ल्ड डेव्लपमेंट रिपोर्ट) में नरेगा को "विकास के लिए बाधा" कहा था। लेकिन इस मामले में, 2014 तक आते-आते वर्ल्ड बैंक की राय बदल गयी। नरेगा के बहुआयामी विकास योगदान देखते हुए इसने 2014 की वर्ल्ड डेव्लपमेंट रिपोर्ट में इसे ग्रामीण विकास की ‘दरख़्शां मिसाल’ (‘स्टेलर एक्ज़ैंपल ऑफ रुरल डेव्लपमेंट’) की संज्ञा दी है।
कुल मिल कर, मनरेगा के न तो सामाजिक-आर्थिक लाभ कम हैं और न ही यह अर्थव्यवस्था पर भार है। अगर कमी है तो मौजूदा हुक्मरानों (और देश की अर्थव्यवस्था के मैनेजरों) में राजनीतिक इच्छाशक्ति की। सवाल आर्थिक व्यवहार्यता (इकनॉमिक वायबिलिटि) का नहीं बल्कि प्राथमिकताओं से भटकने का है। अलबत्ता, इतना ज़रूर है कि नरेगा योजना के क्रियान्वयन में कई झोल है जिसे गवर्नेंस के ज़रिये दूर किया जा सकता है। ‘गुड गवर्नेंस’ का कलमा पढ़-पढ़ कर केंद्र में आने वाली मोदी सरकार से उम्मीद थी कि वह गवर्नेंस को दुरुस्त करेगी। लेकिन वह तो आर्थिक भार और राजकोषीय घाटा का बहाना लेकर ग़रीब आदमी की रोज़ी-रोटी पर लात मारने को आमादा है। यही देश का दुर्भाग्य है; और खोटी आर्थिकी भी।

आतिफ़ रब्बानी,
रिसर्च स्कॉलर (अर्थशास्त्र),
सेंटर फॉर स्टडी इन रीजनल डेव्लपमेंट,
स्कूल ऑफ सोश्ल साइन्सेज़,
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली–110067
-मेल: csrdian@gmail.com, मोब॰ +91–9711795373

19 December 2014

Assassination of Gandhi: The Facts Behind

[प्रख्यात गाँधीवादी चुन्नीलाल वैद्य नहीं रहे। उनसे साबरमती जाकर मिलना सपना रह गया। खास उस वक़्त जब गोडसे को देशभक्त बताया जा रहा है, चुन्नीभाई का दुनिया छोड़ कर जाना एक प्रतिरोध लगता है। उनकी किताब "असैसिनेशन ऑफ़ गाँधी: फैक्ट्स एन्ड फाल्सहुड" गाँधी की हत्या की साजिश का पर्दाफाश करती है। उनके इसी विषय पर लिखे लेख को प्रकाशित करते हुए  स्वाधीन की ओर से उनको विनम्र श्रद्धांजलि…]
          
Chunibhai Vaidya
  
The killer of Gandhiji and his apologists sought to justify the assassination on the following arguments:
“Gandhiji supported the idea of a separate state for Muslims. In a sense he was responsible for the creation of Pakistan.”
“In spite of the Pakistani aggression in Kashmir, Gandhiji fasted to compel the government of India to release an amount of Rs. 55 crores due to Pakistan.”
The belligerence of Muslims was a result of Gandhiji's policy of appeasement.
Scrutinized in the light of the recorded history these prove to be clever distortions to misguide the gullible. Gandhiji in those days was very active in the rough and tumble of politics. The proposal for partition of the country and violent reaction against it generated tensions which ultimately resulted in sectarian killings on a scale unprecedented in human history. For the ethnic Muslims, Gandhiji was a Hindu leader who opposed creation of Pakistan on sectarian grounds. Ethnic Hindus looked upon him as an impediment of their plan to revenge the atrocities on Hindus. Godse was a child of this extremist thinking.
The assassination of Gandhiji was a culmination of decades of systematic brain-washing. Gandhiji had become a thorn in the flesh of the hardcore Hindus and in course of time this resentment turned into a phobia. Beginning with the year 1934 over a period of 14 years on as many as six occasions attempts were made to kill Gandhiji. The last one by Godse on 30-1-48 was successful. The remaining five were made in 1934, in the months of July and September 1944, September 1946 and 20th January 1948. Godse was involved in two previous attempts. When the unsuccessful attempts of 1934, 1944 and 1946 were made the proposal regarding the partition and the matter regarding release of Rs. 55 crore to Pakistan were not in existence at all. The conspiracy to do away with Gandhiji was conceived much earlier than the successful accomplishment thereof. Tire grounds advanced for this heinous crime are clever rationalization to hoodwink the gullible. The staging of the play entitled, "Mee Nathuram Godse Boltoy" is a clear proof of the fact that the mindset that led to Gandhiji's assassination has not disappeared from our national life.
A civil society is wedded to the democratic method of resolving differences by a frank and open debate and evolving a working consensus. Gandhiji was always open to persuasion. Gandhiji had invited Godse for discussions but the later did not avail of this opportunity given to him. This is indicative of the lack of faith in democratic way of resolving differences on the part of Godse and his ilk. Such fascist mindset seeks to do away with dissent by liquidating the opponents.
The Hindu backlash was as much responsible for the creation of Pakistan as the sentiments of the ethnic Muslims. The hard core Hindus looked down upon the Muslims as misguided "Mlechchh" - unclean and came to believe that coexistence with them was not possible. Mutual distrust and recriminations led the extremists among both the groups to regard Hindus and Muslims as different nationalities and this strengthened the Muslim league's demand for partition as the only possible solution to the communal problem. Vested interests on both the sides stirred up the separatist sentiment and sought to justify their hate - campaign by clever and selective distortion of history. It is indeed a matter for serious concern for the nation that this mentality has not disappeared even today.
Poet Mohamed Iqbal who wrote the famous song "Sare Jahanse Acchchha Hindostan Hamara" was the first to formulate the concept of a separate state for Muslims as early as 1930. Needless to state that this sentiment was in a sense, strengthened by Hindu extremists. In 1937 at the open session of the Hindu Mahasabha held at Ahmedabad, Veer Savarkar in his presidential address asserted : "India cannot be assumed today to be Unitarian and homogenous nation, but on the contrary there are two nations in the main - the Hindus and the Muslims." (Vide writings Swatantrya Veer Savarkar, Vol. 6 page 296, Maharashtra Prantiya Hindu Mahasabha, Pune). In 1945, he had stated "I have no quarrel with Mr. Jinnah's two nation theory. We, the Hindus are a nation by ourselves, and it is a historical fact that the Hindus and the Muslims are two nations." (vide Indian Educational Register 1943 vol. 2 page 10). It was this sentiment of separate and irreconcilable identities of the followers of these religions that led to the formation of Pakistan.
In complete contrast to this mentality Gandhiji throughout his life remained an un-compromising advocate of oneness of God, respect for all religions, equality of all men and non-violence in thought, speech and action. His daily prayers comprised verses, devotional songs and readings from different scriptures. All people irrespective of their allegiance to different religions, attended those meetings. Till his dying day Gandhiji held the view that the nationality of fellow citizens was not in any way affected by the fact of his subscribing to religious belief other than yours. During his life, on more than one occasions he strove for unity and equality among Hindus themselves as well as amity among Hindus and Muslims even risking his life. The idea of partition was an anathema to him. He was given to saying that he would sooner die than subscribe to such a pernicious doctrine. His life was an open book and no substantiation is necessary on this score.
Under Gandhiji's leadership communal amity occupied the pride of place in the constructive programmes of the Congress. Muslim leaders and intellectuals of national stature like Abdul Gaffer Khan, Maulana Azad, Dr. Ansari Hakim Ajmal Khan, Badruddin Tayabji, even Mr. Jinnah himself were in the Congress fold. It is but natural that Congress opposed the proposal for the division of the country but as a result of the incitement on the part of the lumpen elements among the Hindus and Muslims a tidal wave of carnage and lawlessness engulfed the nation. Faced with the breakdown of law and order in Sindh, Punjab, Baluchistan, North West Frontier Province and Bengal, Congress lost nerve. Mr. Jinnah adopted an inflexible attitude. Lord Mountbatten being motivated by the time-limit given to him by the British Cabinet used all his powers of persuasion and charm to steer all the leaders to solution quick and yet acceptable to all; but the adamantine attitude of Mr. Jinnah made everything except partition unacceptable.
Partition seemed to be the only solution. In the nationwide elections of 1946 Muslim league secured 90 p.c. seats. Faced with such a scenario Congress found it difficult to keep up its morale. Gandhiji conveyed to lord Mountbatten on 5th of April 1947 that he would agree even if the Britishers made Mr. Jinnah the Prime Minister and left the country as it was. But on the other hand Lord Mountbatten succeeded in getting the Congress to agree to partition. Gandhiji was in the dark about it; he was shell-shocked when he learned about it. The only remedy available to him was fasting unto death to dissuade his followers from acquiescence to a ruinous course of action. After sustained soul searching he came to the conclusion that in the prevalent situation such a step on his part would further deteriorate the situation, demoralise the Congress and the whole country. The factors that weighed with him were : (a) Importunate demands of a rapidly changing national scenario, b) Non-existence of alternate set or leaders of proved nationalist credentials.
The most perplexing and yet pertinent question is that Mr. Jinnah was the most vocal protagonist of Pakistan and with the intentional or otherwise efforts of Mountbatten he succeeded in carving it out; then, instead of making the two his targets why did Godse select one for murder who vehemently opposed the idea of partition till the resolution by the Congress accepting the partition of the country was passed on 3rd June 1947 and Pakistan became fate accompli? Or is it that, as Savarkar put it, he had no quarrel with Mr. Jinnah and his two-nation theory but, can one surmise that he and his apologists had real quarrel with Gandhi and Gandhi alone?
In view of this Gandhiji acquiesced into the situation. It is necessary to point out an aspect of Gandhiji's personality that made him source of unabated distrust and dislike in the eyes of hard core Hindus. Though he was devout Hindu, he had most amicable and warm relations with many who did not belong to the Hindu fold. As a result of this exposure he had developed an eclectic religious sense based on oneness of God and equality of all religious sense based on oneness of God and equality of all religions. Caste divisions and untouchability prevalent among the Hindu social organization distressed him immensely. He advocated and actively encouraged inter-caste marriages. Lastly he blessed only those marriages wherein one of the partners belonged to the untouchable castes. Vested interests amongst high caste Hindus viewed this reformist and other religious programmes with bitter resentment. In course of time it developed into a phobia and thus he became an anathema to them.
The matter regarding release of Rs. 55 crores to Pakistan towards the second installment of arrears to be paid to it under the terms of division of assets and liabilities requires to be understood in the context of the events that took place in the aftermath of partition. Of the 75 crore to be paid the first installment of Rs. 20 crore was already released. Invasion of Kashmir by self-styled liberators with the covert support of the Pakistani Army took place before the second installment was paid. Government of India decided to withhold it Lord Mountbatten was of the opinion that it amounted to a violation of the mutually agreed conditions and he brought it to the notice of Gandhiji. To Gandhiji's ethical sense the policy of tit for tat was repugnant and he readily agreed with the Viceroy's point of view. However, linking his stand in this matter with his fast he undertook, as you will find in the following lines, is an intentional mix-up and distortion of facts of contemporary history. The fast was undertaken with a view to restoring communal amity in Delhi. Gandhiji arrived from Calcutta in September 1947 to go to Punjab to restore peace there. On being briefed by Sardar Patel about the explosive situation in Delhi itself he changed his plans and decided to continue his stay in Delhi to restore peace with the firm determination to "Do or Die."
Influx of Hindus from Pakistan who were uprooted and who had suffered killings of relatives, abduction and rape of women and looting of their belongings had created an explosive situation. Local Hindus who were outraged by the treatment meted out to their Hindu brethren and the anger of local Muslims against reports of similar outrages on their coreligionists in India made Delhi a veritable witches' cauldron. This resulted in killings, molestation, torching of houses and properties. This caused deep anguish to Gandhiji. What added poignancy to this was the realization that it happened in India itself just after an unique incident in the history of mankind : doing away of the shackles of a colonial regime by non-violent means. It was in this background in his mind that he undertook fast unto death to restore communal amity and sanity in Delhi. And, as if to allow the critics of Mahatma Gandhi a chance to mix-up and maneuver, the decision of the government of India to release Rs. 55 crore to Pakistan came during this period of his fast.
The following facts dissolve this much touted thesis that Gandhiji had fasted to bring moral pressure on government of India to relent.: 
a.         Dr. Sushila Nair, as soon as she heard Gandhiji proclaim his decision, rushed to her brother Pyarelal and informed him in a huff that Gandhiji had decided to undertake fast till the madness in Delhi ceased. Even in those moments of inadvertence the mention of 55 crore of rupees was not made which clearly proves that it was not intended by Gandhiji.
b.         Gandhiji's own announcement about his resolve on 12th January in the evening prayer meeting did not contain any reference to it. Had it been a condition, he would have certainly mentioned it as that.
c.         Similarly, there was no reference to it in his discourse on 13th January.
d.         Gandhiji's reply on the 15th January, to a specific question regarding the purpose of his fast did not mention it.
e.         The press release Of the government of India did not have any mention thereof.
f.          The list of assurances given by the committee headed by Dr. Rajendra Prasad to persuade Gandhiji to give up his fast did not include it.
We hope these facts should put at rest the 55 crore concoction at rest.
With regard to the last allegation regarding appeasement of Muslims, it should be conceded that a certain amount of antagonism between Hindus and Muslims existed in the nation. The colonial power cleverly exploited it during its reign and inevitably the result the division of the country came into being. Long before Gandhiji appeared on the national stage sagacious leaders like B.G. Tilak had started attempts to secure the participation of Muslims in the nationalist struggle. Under what came to be known as Lucknow pact Lokmanya Tilak, Annie Peasant and Mr. Jinnah evolved a formula under which the Muslims would get representation greater than what would be justified on the basis of the percentage of Muslim population. The frank and bold statement of Tilak defending the Pact is an eloquent refutation of the charge that Gandhiji began the policy of appeasement of Muslims. The author of the play "Mee Nathuram Godse Boltoy" Shri Pradip Dalvi described the order of Maharashtra government banning the staging of the play as an attack on freedom of expression. This is a travesty of truth and perversion of the fundamental right guaranteed by the constitution. The constitution also provides for ban on the abuse of this freedom vide its section 19(2). The implications of what Shri Dalvi and ilk profess requires to be carefully analysed. Under the guise of defending the freedom of expression what they are seeking to do is to advocate the right to murder those who do not agree with them; they seek to spread hatred and violence; they want to propagate the pernicious doctrine that under certain circumstances the murder of the opponent becomes an act of religious sacrifice. It is revolting to find that the heinous murder of one who was a living embodiment of nonviolence, peace and love and who was as defenseless as a naked new born child should be made a scaffolding for a neo-fascist doctrine.
Godse is no more but the mindset which gave birth to such distorted philosophy is unfortunately still with us. One can dismiss what he did as an act of a lunatic bigot. Assassination by itself is not as wicked as the attempts to rationalize, justify masquerade it as religious act. Permitting such plays to be staged amounts to permitting mis-education of our children. Only sane response to such insidious propaganda is unequivocal rejection thereof.



12 December 2014

सांप्रदायिक राजनीतिक दर्शन का मोहरा था गोडसे

Displaying DSC06612.JPG
सौरभ बाजपेयी 
दैनिक हिन्दुस्तान 
29 जनवरी, 2009 

[29 जनवरी, 2009 के दैनिक हिन्दुस्तान में छपा यह आलेख फिर से पढ़े जाने की जरूरत है। गोडसे कोई व्यक्ति नहीं था, एक विचारधारा का मोहरा था। जैसा विनोबा ने संघ के बारे में चेताते हुए कहा था - "यह सिर्फ दंगा- फसाद करने वाले उपद्रवियों की जमात नहीं है। यह फिलाॅसफरों की जमात है।" गोडसे मोहरा था, फँस गया। सावरकर और संघ फिलाॅसफर थे, बच निकले। जैसे आज नीचे के लोग गाँधी की हत्या को जायज़ ठहराते हैं और ऊपर बैठे फिलाॅसफर उसका खंडन करते हैं।]
30 जनवरी 1948 को शाम की प्रार्थना का समय हो चुका था गांधी बिड़ला हाउस के अहाते में तेज़ कदमों से प्रार्थना स्थल की ओर बढ़ रहे थे अचानक भीड़ के बीच से निकल, नाथूराम गोडसे ने मनु को धक्का दिया और पिस्ताॅल से तीन गोलियां गांधीजी पर दाग दीं नेहरू के शब्दों में कहें तो हमारे बीच से रौशनी चली गई बंटवारे की आग में झुलस रहे उपमहाद्वीप में गांधी की हत्या अगर किसी मुसलमान ने की होती तो क्या होता सांप्रदायिक हिंसा गृहयुद्ध में तब्दील हो जाती और धर्मनिरपेक्ष भारत का ताना-बाना बिखर जाता मगरधरती के महानतम् जीवित हिन्दूकी हत्या एक धर्मांध हिन्दू ने कर दी तो सारा माहौल बदल गया ऐसा किसी ने नहीं सोचा था हिन्दू सांप्रदायिकता लोगों की घृणा का पात्र बन गयी सांप्रदायिक नफ़रत के विरूद्ध जीते-जीवन मैन बाउंड्री फोर्सबन चुके महात्मा ने मरते-मरते हिन्दू सांप्रदायिकता को जोरदार चोट पहुंचा दी थी गांधीजी के दार्शनिक पोते, रामचंद्र गांधी ने सच ही कहा था- ‘गांधी को गोलियों ने नहीं, घातक गोलियों को गांधी ने अपने सीने में रोका था
10 दिन पहले यानी 20 जनवरी 1948 को भी गांधीजी की प्रार्थना सभा पर बम फेंका गया था गांधी अविचलित अपनी जगह बैठे रहे- डरो मत, कुछ नहीं हुआ है भयभीत मनु से उन्होंने कहा- डर गईं ? प्रार्थना करते-करते समाप्त हो जाना.... इससे बेहतर मृत्यु क्या हो सकती है लेकिन जब किसी ने उनसे कहा कि यह किसी सिरफिरे का पागलपन था, तो गांधी बोले- बेवकूफ, तुम नहीं देख पा रहे हो, इसके पीछे एक बड़ी भयानक साजिश है
दरअसल, गांधी का जवाब सांप्रदायिक गिरोहों के पास था ही नहीं इसीलिए मुस्लिम सांप्रदायिक उन्हें मुसलमानों का दुश्मन और हिन्दुओं का नेता बताते थे तो हिन्दू सांप्रदायिक उन्हें हिन्दूओं का दुश्मन और मुसलमानों का हितैषी बताते फिरते थे हिन्दू और मुसलमान जनता पर गांधी का एक समान प्रभाव उन्हें विचलित करता था हिन्दू महासभा और आरएसएस और दूसरी ओर मुस्लिम लीग को अपनी सांप्रदायिक महत्वकांक्षाओं के बीच गांधी रोड़ा लगते थे इसीलिए गांधी को रास्ते से हटाने के अपरोक्ष आह्वान दोनों ओर से खूब किए जाते रहे  
एक बार बंगाल के सुहरावर्दी ने, जिन पर हजारों हिन्दुओं के क़त्ल का पाप चढ़ा था, गांधीजी से कलकत्ता में रूककर मुसलमानों की जान बचाने की फरियाद की गांधी रूक गए, पर एक शर्त पर- सुहरावर्दी दंगाग्रस्त मुस्लिम बस्ती के एक उजड़े हुए घर में उनके साथ ही रहेंगे एक रात दंगाई भीड़ ने घर पर हमला बोल दिया रहस्यमय ढंग से सुहरावर्दी ग़ायब थे दरअसल, वे शाम होते ही सुरक्षा और विलासिता से युक्त अपनी आलीशान हवेली में भाग जाते थे अगर पुलिस समय पर पहुंचती तो गांधी की जान उसी दिन चली जाती आम मुसलमानों की जान बचाने के लिए सुहरावर्दी अपनी जान आफत में नहीं डाल सकते थे, गांधी को जान की कोई परवाह नहीं थी  
दूसरी ओर, हिन्दू राष्ट्र का नारा गांधी के राम-राज्य के सपने के आगे टिक नहीं पाता था इसीलिए कहा गया कि बंटवारा गांधी ने करवाया और अब (पाकिस्तान को वायदे के मुताबिक 55 करोड़ रूपया देने के लिए) पाकिस्तान की तरफदारी कर रहे हैं। एक बार गोलवलकर ने ढाई हजार स्वंयसेवकों को संबोधित करते हुए कहा- संघ पाकिस्तान को मिटा देगा और अगर कोई बीच में आया तो उसे भी गांधी बीच में गये थे, इसीलिए मार दिए गये वे मार्च 1948 में पाकिस्तान जाना चाहते थे उनका मानना था- लोगों ने विभाजन को हृदय से स्वीकार नहीं किया है और यह भी कि, बंटवारा नफ़रत की बुनियाद पर खड़ा था और उसे सिर्फ प्यार से जीता जा सकता था  
इस तरह गांधी की हत्या एक साजिश थी गोडसे कोई भटका हुआ व्यक्ति नहीं था, वह तो घृणा और हिंसा पर आधारित एक रानीतिक दर्शन का मोहरा-भर था पहले भी महासभा के लोगों ने कल्याण और पूना के बीच गांधी स्पेशल ट्रेन को पटरी से उतारकर उन्हें मारने की कोशिश की थी गांधी की हत्या के माह भर बाद विनोबा भावे ने दो टूक लहज़े में कहा था- "एक धार्मिक अख़बार में मैंने उनके गुरूजी का लेख या भाषण पढ़ा उसमें लिखा थाहिन्दू धर्म का उत्तम आदर्श अर्जुन है उसे अपने गुरूजनों के लिए आदर और प्रेम था उसने गुरूजनों को प्रणाम किया और उनकी हत्या की इस प्रकार की हत्या जो भी कर सकता है वह स्थितिप्रज्ञ है बेचारी गीता का इस प्रकार उपयोग होता है मतलब यह है कि यह सिर्फ दंगा-फसाद करनेवाले उपद्रवियों की जमात नहीं है यह फिलाॅसफरों की जमात है " ध्यान रहे, गोडसे ने भी गांधी को प्रणाम किया और फिर उनकी हत्या की मरने से पहले उसने कहा- मेरी अस्थियां सिन्धु नदी में डाली जाएं क्योंकि बाकी सारी नदियां गांधी की अस्थियों से प्रदूषित हो चुकी हैं यह नफ़रत की फिलाॅसफी थी  
गोडसे मोहरा था, बहक गया सावरकर फिलाॅसफर थे, बच निकले पूरी ट्रायल भर सावरकर ने गोडसे को नज़र घुमा कर नही देखा साक्ष्यों के अभाव में वे बरी हो गये लेकिन 1965 में बनी जीवनलाल कपूर कमिटी जब तक उनके संलिप्तता के प्रमाण खोज पाती, सावरकर मर चुके थे 1948 के बाद तकरीबन डेढ़ साल तक आरएसएस प्रतिबंधित रहा नाथूराम संघ का ही बौद्धिक कार्यवाह था गोलवरकर ने पटेल से हर अपराध के लिए क्षमा मांगी वह दिन था और आज का दिन है- संघ तो गांधी की हत्या का जुर्म कबूलता है और ही खुद को राजनीतिक संगठन कहता है पर गांधी और उनकी सोच के खिलाफ उसकी कवायद जारी है  

अनुवाद करें