30 January 2015

गांधीजी की हत्या, आरoएसoएसo और मिठाईयाँ



आलोक बाजपेयी 
[बतौर दूसरी किश्त पेश है आलोक बाजपेयी का यह आलेख। आलोक बाजपेयी गाँधी के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा गाँधी को पढ़ने और समझने में लगाया है। वह गाँधी और साम्प्रदायिकता के बीच छुपे बुनियादी अन्तर को इस आलेख के माध्यम से समझाते हैं....]
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों के लिए महात्मा गांधी की हत्या हमेशा एक हर्ष, उन्माद और गौरव का प्रतीक रहा है। ऐसा होना बिल्कुल स्वाभाविक भी है। गांधी का जीवन हर उस चीज के खिलाफ था, जिसे आर0एस0एस0 सही समझता रहा है। जैसे धार्मिक दम्भ, अभिमान और अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ समझना और दूसरे धर्माें को नीचा मानना आर0एस0एस0 की धार्मिक सोच का एक स्थाई आधार है। यह सोच उनके लिए प्राण वायु के समान है। गांधी की सोच धर्म के मामले में इससे एकदम उलट है। उनके लिए धार्मिक होने का मतलब था, मानव मात्र से असीम प्यार, स्वयं के लघु होने का भाव और मुसीबतों में बिना विचलित हुए दृढ़ता से झूझने की आन्तरिक क्षमता का स्रोत। आर0एस0एस0 और गांधी धर्म की दो विपरीत व्याख्याओं के बिन्दु हैं। अतः यदि गांधी की हत्या पर आर0एस0एस0 ने खुशियां मनाईं या उनके संस्थानों में गांधी के हत्यारे गोडसे को नायक के रूप में चित्रित करने वाली किताबें बेची या पढ़वाई जाती हैं तो इसमें कुछ भी आश्चर्य सा नहीं। आखिर अपने सबसे प्रमुख शत्रु की हत्या पर खुश होने का अधिकार तो उन्हें मिलना ही चाहिए न?
अस्वाभाविक मात्र यह है कि आर0एस0एस0 गांधी की हत्या की इस खुशी को जहां एक ओर तमाम सूक्ष्म तरीकों से व्यक्त करता रहता है, वहीं दूसरी ओर इससे इनकार भी करता रहा है। यह लेख इसी व्यक्त-अव्यक्त खुशी को समझने का लघु प्रयास भर है।


पहली बात जो गांधी और आर0एस0एस0 के बीच का बुनियादी अन्र्तविरोध है, वह यह कि जहां गांधी सार्वजनिक जीवन में पूरी पारदर्शिता के हिमायती थे, वहीं गोपनीयता आर0एस0एस0 की मूलभूत विशेषता है। जहां गांधी अपने दिल और दिमाग को बेबाकी से बिना किसी से डरे हुए लिखते-बोलते रहते थे, वहीं दूसरी ओर आर0एस0एस0 के लाखों स्वयंसेवकों या उसके शीर्ष नेतृत्व के लोग सार्वजनिक तौर पर लिखने-पढ़ने या बोलने के तरीकों में विश्वास ही नहीं करते। गांधी का समग्र लेखन सौ जिल्दों में छपा है और उनके बारे में सब पढ़ने-जानने के लिए दस-बीस साल लग जाएंगे, वहीं आर0एस0एस0 के बारे में आर0एस0एस0 के लोगों द्वारा लिखा-बोला पुस्तक बाजार में लगभग अप्राप्य है। हेडगेवार, गोलवरकर और अन्य आर0एस0एस0 सरसंघ चालकों की जो भी मुटठी भर पुस्तिकाएं हैं भी, वो भी पुस्तक बाजार में अनुपलब्ध रखी जाती हैं। वास्तव में आर0एस0एस0 संगठन की सोच क्या है, यह जानना सामान्य जन के लिए बहुत मुश्किल है, क्योंकि एक दुर्दांत गोपनीयता आर0एस0एस0 के मूल विचार, उनकी कार्यपद्धति, उनके संगठन के लोगों के नाम पते, उनका वित्तीय आधार, उनके अभियान और वो सारी बातें, जिसे जानने का लोकतांत्रिक समाज में सभी को हक होना चाहिए, एक गोपनीय रहस्यालोक में ढका-छिपा रहता है। तो, गांधी और आर0एस0एस0 दो अलग-अलग तरह के एक-दूसरे के विरोधी विचार हैं। फिर, गांधी की हत्या पर आर0एस0एस0 क्यों न खुश हो?
दोनों में एक दूसरा बुनियादी अन्तर राजनीतिक विचारधारा का है। गांधी जहां लोकतंत्र के दायरे में कार्य करते थे और अहिंसा, सत्य जैसे सिद्धान्तों के सहारे अपनी बातों को फैलाने में कुशल रणनीतिज्ञ थे, वहीं आर0एस0एस0 का मुख्य वैचारिक आधार और रूझान फासीवाद है। फासीवाद के नायक हिटलर उनके आदर्श आज भी हैं। फासीवाद एक सोच है, जिसके काम करने के तौर-तरीके जहां एक ओर गोपनीय एजेण्डे के तहत चलते हैं, वहीं दूसरी ओर उसमें किसी धर्म विशेष के प्रति नफरत, हिंसा अपने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में गुथी रहती है। भारत में आर0एस0एस0 के अधीन जो फासीवादी विचारधारा उसकी स्थापना के दिन से ही पल-बढ़ रही है, उसके मूल में मुस्लिम विरोध है। इसी कारण से आर0एस0एस0 उन्हीं प्रश्नों में दिलचस्पी लेता है, जिसमें घुमा-फिरा कर किसी न किसी तरह किसी मुस्लिम व्यक्ति या इस्लाम को दोषी बनाया जा सके। चूंकि आर0एस0एस0 एक लोकतांत्रिक संगठन नहीं है, अतः उसके भीतर निर्भीक व तर्कपूर्ण ढ़ंग से बात रखने की न तो कोई परम्परा रही है और न ही यह स्पेस रखा गया है। यही कारण है कि आर0एस0एस0 के लोगों के साथ कोई अर्थपूर्ण संवाद-विवाद किया जा सकना लगभग असम्भव है। चूंकि आर0एस0एस0 एक फासीवादी परिधि में ही सोच पाती है, अतः छल-कपट, धोखा, झूठ का व्यापार और कुटिल चालाकी उनके सोच व कार्य पद्धति का एक अभिन्न अंग है। आर0एस0एस0 में मानवीय मूल्य और नैतिकता जैसी चीजों का स्थान नहीं रहता, क्योंकि फासीवादी सोच पद्धति में साध्य ही अभीष्ट रखा जाता है, साधन की शुचिता एक अनर्गल प्रलाप समझा जाता है। यही कारण है कि हिंसा (शारीरिक व मानसिक) उनका सबसे विश्वसनीय हथियार आज भी बना हुआ है। तो गांधी और आर0एस0एस0 के तौर-तरीके, सोच में इतना दुश्मनीपूर्ण अन्तर है कि आर0एस0एस0 के पास गांधी की हत्या पर दुखी होने का लेशमात्र भी कारण मौजूद नहीं है।
दोनों में एक अन्य बुनियादी अन्तर राष्ट्रवाद की अवधारणा का है। गांधी का राष्ट्रवाद से तात्पर्य सभी भारतवासियों से था, जिसमें सभी को अपनी इच्छा अनुरूप जीने का हक हो और सभी का मान-सम्मान सुरक्षित रहे। कोई एक बिरादरी दूसरी बिरादरी पर हावी न होने की कोशिश करे, एक संस्कृति दूसरी संस्कृति को नीचा दिखाने की ही जुगत में न लगी रहे। गांधी के लिए लगातार देशवासियों को यह याद दिलाना जरूरी था कि अपने देश से लगाव रखने का मतलब यह नहीं कि हम अपने आप को इतना श्रेष्ठ समझने लगें कि दूसरे मुल्क और उनकी संस्कृतियां बिल्कुल हीन लगें। इसके अलावा गांधी ने धर्म के आधार पर राष्ट्रवाद की आवधारणा को पूर्णतः नकार दिया। यानि कि हिन्दुस्तान में कोई एक धर्म वाला समुदाय ही अपने को उसका कर्णधार समझने लगे। संक्षिप्त में, राष्ट्र का आधार धर्म नहीं हो सकता। गांधी समझते थे कि जिन देशों में वहां की जनता ने गुमराह होकर धर्म को राष्ट्र का आधार बनाया, उन्होंने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। इसीलिए गांधी ने राष्ट्रवाद की एक उदार, उदात्त, बहुसंस्कृति धर्मी और अन्तर्राष्ट्रीयतावादी तहजीब को ही अपनी सोच का आधार बनाया। आर0एस0एस0 की सोच इसके ठीक उलट है। आर0एस0एस0 स्वयं को एक ’’राष्ट्रवादी’’ संगठन कहता तो जरूर है, परन्तु उसका तथाकथित राष्ट्रवाद मात्र ’’हिन्दू पुनरूत्थानवाद’’ और संकीर्ण फिरकापरस्ती से ज्यादा कुछ नहीं। सच तो यह है कि भारत में राष्ट्रवाद का जो नक्शा दादाभाई नौरोजी, रानाडे और अन्य महान देशभक्तों ने बनाया तथा जिसे बाद में गोखले, तिलक, गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष बोस व अन्य ने अपने खून-पसीने से सीचा, उसका आर0एस0एस0 के हिन्दू पुनरूत्थानवादी दृष्टिकोण से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं है। आर0एस0एस0 के लिए राष्ट्रवाद की एकमात्र बुनियादी बात मुस्लिम विरोध है। तो फिर यह समझना आसान ही है कि क्यों आर0एस0एस0 ने गांधी की हत्या पर खुशियां मनाईं, जो आज भी किसी न किसी रूप मंे जारी हैं।
आर0एस0एस0 हिन्दू पुनरूत्थान के नाम पर जो काम अपनी पैदाइश से करता रहा है, वहीं काम आजादी के पहले मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए किया। मुस्लिम लीग को अपनी फिरकापरस्ती के कुचक्र में आर0एस0एस0 से ज्यादा सफलता मिल गई और वो पाकिस्तान बना लेने में कामयाब भी हो गया। हिन्दुस्तान में आर0एस0एस0 को यह बुरी तरह सालने लगा कि मुस्लिम लीग ने तो मुसलमानों को एकजुट कर पाकिस्तान बना लिया, लेकिन हिन्दू बेवकूफ के बेवकूफ ही रहे और वो आर0एस0एस0 के झण्डे तले नहीं आए और एक हिन्दू राष्ट्र नहीं बना पाए। चूंकि गांधी भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के सबसे बड़े नेता और प्रतीक थे, तो आर0एस0एस0 ने इसका ठीकरा उन्हीं के सर पर फोड़ना सही समझा। उसे यह एक अवसर भी लगा कि देश बटवारे से लोगों के मन में जो गुस्सा मुसलमानों के खिलाफ भर गया है, उसका फायदा उठाना चाहिए। नाथूराम गोडसे, जो कि हिन्दू पुनरूत्थानवादी सोच और आर0एस0एस0 की विचारधारा से ग्रसित था, उसने 30 जनवरी, 1948 को गांधी की हत्या कर वह अवसर आर0एस0एस0 को दे दिया कि वह खुशियां मना सके, मिठाईयां बांट सके। अब वही सोच गोडसे की मूर्तियां लगा कर पुराना कर्ज उतारना चाहती है।
गांधी ने कहा था कि मेरी जान की चिन्ता मत करो मैं अपनी कब्र से भी बोलता रहूंगा। गांधी अभी भी बोल रहे हैं।

(आलोक बाजपेयी एक इतिहासकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

29 January 2015

मजबूती का नाम महात्मा गांधी

पुरुषोत्तम अग्रवाल

[यह व्याख्यान प्रो० पुरुषोत्तम अग्रवालजी ने गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान, नयी दिल्ली में 2 अक्टूबर 2005 को दिया था। ब्लॉग की अपनी पठनीय सीमा के चलते यहाँ उसका संक्षिप्त रूप दिया जा रहा है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण व्याख्यान गाँधी के नाम से जुड़े मजबूरी के जुमले को नेस्तनाबूद कर देता है। यह सिद्ध हो जाता है कि अहिंसा और साहस एक दूसरे के पर्याय हैं। जो जितना साहसी है उतना ही अहिंसक हो सकता है। एक बार बादशाह खान (खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान) ने गाँधी से कहा कि हमारे यहाँ तो पठान बड़ी आसानी से अहिंसक तरीकों से ज्यादतियों का सामना कर लेते हैं। इस पर गाँधी का जवाब था कि पठान बहादुर कौम है इसीलिए वो इतनी आसानी से अहिंसा का पालन कर लेते हैं। अहिंसा बुजदिलों के बस की चीज़ नहीं। हम जल्द ही इस व्याख्यान के शेष भाग को भी आपके सामने रखने की कोशिश करेंगे.... ]


गांधीजी ने अपनी आत्मकथा के आमुख में एक बहुत ही मार्मिक घटना का उल्लेख किया है। उन्होंने आत्मकथा लिखने का निर्णय किया। गांधीजी लिखते हैं कि 'एक निर्मल भाई ने मुझसे पुछा कि आत्मकथा लिखने की कोई परंपरा भारत में नहीं है। आत्मकथा एक ठेठ पाश्चात्य विधि है। आप क्यों आत्मकथा लिखने बैठ गए ?' गांधीजी लिखते हैं कि 'मुझे उनकी बात में दम नज़र आया। लेकिन फिर भी मैं ये आत्मकथा लिख रहा हूँ क्योंकि असल में यह कोई 'आत्म की कथा' नहीं है। यह तो मेरे प्रयोगों की कथा है। और मुझे लगता है कि मेरे प्रयोगों से शायद दूसरों को भी कुछ लाभ हो। इसलिए मैं इसको लिख रहा हूँ।' इस क्रम में गांधीजी ने अंतर किया अपने राजनीतिक और आध्यात्मिक प्रयोगों में। गांधीजी ने कहा कि मेरा जीवन इतना सार्वजनिक है कि मेरी राजनीति सब लोग जानते हैं, उसकी जानकारी सबको है। अपने बहुत ही प्रसिद्ध लेकिन कम सराहे गए सेंस ऑफ़ ह्यूमर के साथ गांधीजी ने लिखा कि अब तो मेरे राजनीतिक प्रयोगों की चर्चा सभ्य देशों में भी होने लगी है। सभ्य शब्द को उन्होंने 'इनवर्टेड कॉमाज़' में रखा। मैं गांधीजी का वह वाक्य यहां पढ़ना चाहता हूँ-- "मैं आत्मकथा लिख रहा हूँ" गांधीजी ने लिखा "अपने आध्यात्मिक प्रयोगों को समझने और लोगों तक उन्हें पहुँचाने के लिए मुझे अपने आध्यात्मिक प्रयोग का, जिन्हें मैं ही जान सकता हूँ और जिनसे मेरी राजनीतिक जीवन सम्बन्धी जीवन शक्ति पैदा हुयी है, उन प्रयोगों का वर्णन करना अवश्य भायेगा। ज्यों- ज्यों मैं विचार करता हूँ-- अपने अतीत पर दृष्टि डालता हूँ, त्यों- त्यों अपनी अल्पता मुझे साफ़ दिखाई देती है।" मुझे लगा कि गांधीजी के यह वाक्य मेरे जैसे छोटे व्यक्ति के लिए भी दीपक का काम करते हैं। ज्यों- ज्यों मैं अपने अतीत पर दृष्टि डालता हूँ मुझे अपनी अल्पता साफ़ दिखाई देती है। और उस अल्पता के प्रयोगों को ही आपके सामने रखने की धृष्टता का परिणाम है यह व्याख्यान….

व्याख्यान का विषय मैंने खुद चुना था। 'मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी' यह मैं भी मानता था बहुत लम्बे अरसे तक। मैं भी इसे कहता था। अल्पता के बोध के साथ कह सकता हूँ कि तब 'रहहुँ अति ही अचेत' जब कहा करता था कि मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी। धीरे- धीरे मैंने महसूस किया और गौर से सोचें तो हम सब महसूस कर सकते हैं कि असल में मजबूरी हिंसा है। हिंसा दृढ़ता और शक्ति को प्रकट नहीं करती। हिंसा मजबूरी को प्रकट करती है। मैं आज तक किसी ऐसे व्यक्ति, विचार या सत्ता के सम्पर्क में नहीं आया हूँ, जिसने हिंसा करते हुए यह न कहा हो कि 'हम तो हिंसा के लिए मजबूर थे।' राज्यसत्ता हिंसा करती है क्योंकि उसे व्यवस्था बनाये रखने की मजबूरी है। क्रांतिकारी हिंसा करते हैं क्योंकि राज्य सत्ता ने उन्हें विवश कर दिया है, उन्हें मजबूर कर दिया है कि वे हिंसा करें। अध्यापक हिंसा करते हैं क्योंकि बिना हिंसा और अनुशासन के बच्चों को सिखाया नहीं जा सकता। बच्चे हिंसा करते हैं क्योंकि हिंसा के बिना समाज सुनने को तैयार नहीं है। तो इस उलटबांसी को हम आत्मसात किये बैठे हैं। और, केवल हम ही नहीं सारी दुनिया आत्मसात किये बैठी है कि अहिंसा मजबूरी का प्रमाण है और हिंसा ताकत का।  मुझे लगता है बात उलटी है। असल में स्वयं हिंसा करने वालों पर अगर आप ध्यान दें, चाहे वे सरकारी अफ़सर के तौर पर हिंसा करते हों, चाहे वे विचार में हिंसा को सही ठहराते हों, चाहे वे राज्यसत्ता के रूप में हिंसा करते हों। स्वयं हिंसा करने वालो पर अगर आप ध्यान दें, तो आप पाएंगे कि हर हिंसक व्यक्ति और विचार अपने आपको परिस्थितियों के मजबूर दास के रूप में प्रस्तुत करके ही अपने नैतिक संकट का समाधान कर पाता है।

मुझे इस बात का अहसास बहुत देर से हुआ। इस अहसास को उपलब्ध कराने में बहुत सी चीजों का, बहुत से व्यक्तियों का योगदान था.... हिंसा का सम्बन्ध गहरी नैतिक मजबूरी बल्कि अपंगता से है, इस बात का गहरा बोध मुझे अपने जीवन में कराया मेरे मित्र और सिखावनहार दिलीप सीमियन ने। … इस अल्पता और अल्पज्ञता के साथ मैं इस यात्रा को आपके सामने बांटना चाहता हूँ।- 'मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी' से 'मजबूती का नाम महात्मा गाँधी' तक की यात्रा। जाहिर है यह यात्रा गाँधी की नहीं है। यह यात्रा मेरी है। इसलिए संकोच दूर हो सकता है कि 'वामपंथी होने के बावजूद' मुझे बुला लिया। आख़िरकार ऐसी यात्रा करने का अधिकार तो वामपंथियों को भी है ही !        

मित्रों ! 1989 में मैं, दिलीप और हमारे एक मित्र जुगनु रामास्वामी पंजाब गए थे। सड़क के रास्ते, कार से। पंजाब में दो अनुभव ऐसे हुए जिन्हें मैं जीवन भर नहीं भूल सकता। दोनों ही एक अर्थ में आध्यात्मिक अनुभव थे। एक अनुभव था बटाला क़स्बे के चौक पर। पहली बार मुझे मालूम पड़ा कि 'रीढ़ की हड्डी में ठण्डक दौड़ जाने' के मुहावरे का वास्तविक अर्थ क्या होता है। हम लोगों के सामने जा रही एक कार एकाएक रुकी, उसमें से तीन- चार हट्टे- कट्टे नौजवान हाथ में बन्दूकें लिए हुए उतरे और मुझे लगा कि बस हम अभी शहीद होते हैं। दूसरे का शहीद होना बहुत रोमांचक होता है। खुद के शहीद होने की आशंका रीढ़ की हड्डी में ठण्डक दौड़ा देती है। यह अनुभव मुझे उस समय पहली बार हुआ।

दूसरा और इतना ही मार्मिक अनुभव दमदमी टकसाल में हुआ। हम लोग जानते हैं कि दमदमी टकसाल खालिस्तानी आंदोलन का नैतिक और बौद्धिक केंद्र था।  हम लोग वहाँ गए। हमारी उस पंजाब यात्रा का उद्देश्य था, गाँधीजी से बहुत ही तुच्छ, अपने जीवन में, अपने विचार में, बहुत छोटी-छोटी सी प्रेरणा लेते हुए, यह समझने की कोशिश करें कि लोग मरने और मारने पर क्यों उतारू हो जाते हैं। इसलिए हम पंजाब में तरह-तरह के लोगों से मिले, कम्युनिस्टों से, कांग्रेसियों से, भाजपाइयों से और स्वयं उनसे जो स्वतंत्र खालिस्तान के आंदोलन को चला रहे थे।  दमदमी टकसाल ऐसे लोगों का केंद्र था। वहाँ जब हम गए, हमे विस्तार से खालिस्तानी आंदोलन के तर्क को समझाने के लिए लम्बे- लम्बे भाषण पिलाये। हम लोग काफी डरे हुए थे, काफी घबराहट थी। लेकिन दिलीप अपनी आदत के मुताबिक़ बहस पर उतारू थे और बहस चल रही थी। उस बहस के बीच एकाएक, उस बैठक में जो सबसे ज्यादा मुखर, जो सबसे ज्यादा व्यवस्थित रूप से अपनी बातों को कह रहे थे और बहुत सलीके से हमें यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि खालिस्तानी आंदोलन की सफलता के लिए हिंसा और आतंकवाद क्यों अपरिहार्य हैं; वे एकाएक बिना किसी वजह के, बिना किसी पूर्वापर क्रम के बोले, "वैसे जी एक बात है, अगर गाँधीजी होते तो पंगा सुलट जाता।" हमें यह बात समझ में नहीं आई। पूछा कि आपके कहने का मतलब क्या है ? कैसे सुलट जाता पंगा, गाँधीजी के होने से।? वे बोले "देखो जी ऐसा है कि  अगर वे होते तो सारे आतंकवाद और सारी गोलाबारी के बावजूद आते और अमृतसर में भूख हरताल पर बैठ जाते।"



मेरे लिए यह एक आध्यात्मिक अनुभव था। मैं ऐसा कुछ नहीं कह रहा हूँ कि यह कहने वाला व्यक्ति हिंसा का विरोधी हो गया। मैं यह भी नहीं कह रहा हूँ कि ऐसा कहने वाला व्यक्ति गाँधी-मार्ग का पथिक या गांधीवादी हो गया। लेकिन गाँधी की राजनीति, गाँधी का सामाजिक जीवन, गाँधीजी का राजनैतिक जीवन उनके घोर विरोधी के मन में भी संवाद के प्रति आस्था उत्पन्न करता था और करता है। मित्रों ! ध्यान देने की बात यह है जिस भय की चर्चा मैंने अपनी डायरी के अंशों के हवाले से की, वह भय सबसे पहले संवाद की संभावना को ही समाप्त करता है। उस भय का यह केवल एक अनौपचारिक या अनायास काम नहीं है। ऐसा भय, संवादहीनता को संभव करने वाला भय है। हमे इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि यह जानबूझकर और प्रयत्नपूर्वक उत्पन्न किया जाता है। यह केवल संयोग नहीं है। .... 

दमदमी टकसाल का जो संस्मरण मैंने सुनाया, उससे ऐसा लग सकता है कि गाँधी की महत्ता केवल उनके आत्मबलिदान में है। ऐसा नहीं है। गाँधी की महत्ता उनके आत्मबलिदान में, उनके साहस में निश्चित रूप से है, लेकिन वह महत्ता उससे कहीं आगे जाती है। गाँधी की महत्ता है उनके विचार में, उनकी अंतर्दृष्टि में और उनके विवेक में। हमे इस बात को समझना चाहिए। आज के व्याख्यान का जो विषय मैंने चुना 'मजबूती का नाम महात्मा गाँधी' उस पर थोड़ा- सा हम ध्यान दें। मजबूत शब्द ज़बत से बनता है --धीरज, सहन करना, धैर्य के साथ खड़े रहना। मजबूत अनिवार्यतः आक्रामक व्यक्ति को नहीं कहते हैं। मजबूत उस व्यक्ति को कहते हैं जिस व्यक्ति में धीरज हो, जिसमें विवेक हो। इस अर्थ में गाँधीजी की मजबूती प्रेरणाप्रद है और शिक्षाप्रद भी। 

मित्रों, हमारा समय क्रूर हिंसा के साधारणीकरण और विकेंद्रीकरण का समय है। दूसरी चीजों का विकेंद्रीकरण हुआ हो या न हुआ हो जैसे सत्ता का, धन का, उद्योग का, लेकिन आप अपने आसपास के समाज को देखें क्रूरता और हिंसा का अभूतपूर्व विकेंद्रीकरण हुआ है। अब क्रूरता और हिंसा पर केवल राजसत्ता का एकाधिकार नहीं है। आज  के क्रांतिकारी भी केवल सफाया नहीं करते। विधिवत और व्यवस्थित रूप से यातनाएं भी देते हैं। वे केवल वर्ग शत्रुओं का सफाया नहीं करते, वे स्कूली बच्चों से भरी हुयी बस को भी बमों से उड़ा देते हैं। वह मुखबिरों के हाथ- पाँव काटकर उन्हें जीवन भर तड़पने के लिए छोड़ देते हैं। हिंसा और क्रूरता का विकेंद्रीकरण और हिंसा का ऐसा अभूतपूर्व साधारणीकरण मार्टिन लूथर किंग की उस प्रसिद्ध चेतावनी की याद दिलाता है। यह एक करुण विडम्बना है कि जिस भाषण में मार्टिन लूथर किंग ने ये बात कही थी, वह उनका अंतिम भाषण था। मार्टिन लूथर किंग ने कहा था "जिस मोड़ पर हम पहुँच चुके हैं उस मोड़ पर दुनिया के लिए चुनाव अब नॉन- वायलेंस और वायलेंस के बीच में नहीं है। अब चुनाव नॉन-वायलेंस और नॉन-एग्ज़िस्टेन्स के बीच में है। आप हिंसा और अहिंसा में से एक को नहीं चुन सकते। आपको अहिंसा और सर्वनाश के बीच में से एक को चुनना है। गाँधीजी यह बात बार-बार कहा करते थे कि सत्य और अहिंसा, मैं कोई नयी बात नहीं कर रहा हूँ। सत्य और अहिंसा तो शाश्वत हैं। ट्रुथ एंड नॉन वायलेंस आर एज ओल्ड एज हिल्स।" मैं सत्य के बारे में अभी नहीं कहना चाहता कुछ भी। विषय और समय दोनों की सीमा है। लेकिन अहिंसा के प्रसंग में मैं यह दृढ़तापूर्वक कहना चाहता हूँ कि उनका कहना कि "अहिंसा का विचार शाश्वत है, मैं कुछ नया नहीं कह रहा।" यह गाँधीजी की विनम्रता है और इसे शब्दशः नहीं लिया जाना चाहिए। जिस अर्थ में गाँधीजी अहिंसा की बात करते हैं वह मानवीय विचार के इतिहास में सर्वथा अभूतपूर्व और मौलिक है। गाँधीजी की अहिंसा केवल परंपरा से चली आ रही धार्मिक अहिंसा का विस्तार भर नहीं है। इस बात को कुछ अच्छी तरह हमें समझना चाहिए। हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि संसार के सभी धर्मों अहिंसा अंततः एक आदर्श है, एक आइडियल है। जिसे पाने का आपको प्रयत्न करना चाहिए। और जिसको न पाने की स्थिति के जस्टिफिकेशन हमेशा आपके पास तैयार रहते हैं। गाँधीजी के लिए अहिंसा केवल आदर्श नहीं है। गाँधीजी के लिए अहिंसा आपके दैनंदिन जीवन की सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन की बुनियादी कसौटी है। गाँधीजी के लिए अहिंसा केवल आइडियल नहीं है। गाँधीजी के लिए अहिंसा बुनियादी जीवन मूल्य है। इस दृष्टि से गाँधीजी की अहिंसा पारम्परिक धार्मिक अहिंसा से कहीं आगे की चीज है..... 

संसार का का हर धर्म पवित्र और अपवित्र हिंसा के बीच अंतर करता है। संसार का हर धर्म वध और हत्या के बीच अंतर करता है। हत्या अस्वीकार्य है, वध न केवल स्वीकार्य है बल्कि कई स्थितियों में करणीय है। गोडसे के बयान का अर्थ समझना चाहिए। गोडसे जब भी हिंदी या मराठी बोलता था, कभी वो हत्या शब्द का प्रयोग नहीं करता था। गोपाल गोडसे की पुस्तक का शीर्षक ही है 'गाँधी वध आणि मी'। वध नैतिक रूप से स्वीकृत, नैतिक रूप से मान्य प्राणहरण की चेष्टा है, जो कि कई बार जरूरी हो जाती है। इसलिए अहिंसा वहाँ तक ठीक है जहाँ तक कि वह हमारे विचारों, हमारी अवधारणाओं, हमारी आस्थाओं के अनुकूल हों। अहिंसा अपने आप में कसौटी नहीं है। बल्कि अहिंसा ऐसी प्राविधि है, ऐसी मान्यता है जिसे हमें आस्था की कसौटी पर कसना है….

हिंसा गहरे विचार की मांग करने वाला विषय है। संगठित और सोद्देश्य हिंसा की असल में एक प्रतीकात्मक शक्ति होती है। हमारे एक मित्र बहुत ही रोचक चुटकुला सुनाते हैं। बड़ा मानीखेज चुटकुला है। एक मजिस्ट्रेट की अदालत में एक थानेदार साहब ने एक चोर को पेश किया। कहा- "हुज़ूर मैंने इसको पकड़ा है।" चोर था एकदम छरहरा, फुर्तीला और थानेदार साहब थे खूब मोटे, थुलथुल। मजिस्ट्रेट को यह देख कर हंसी आ गयी। उन्होंने कहा कि "चोर को आपने पकड़ा है ! यह जो भागने लगे तो कहीं का कहीं पहुंचेगा और आपके लिए एक कदम भी उठाना भी मुश्किल है। आपने कैसे पकड़ लिया इसको?" तो थानेदार साहब ने कहा -- "हुज़ूर हुकूमत दौड़कर नहीं चलती इकबाल से चलती है। मैंने एक बार कह दिया खबरदार ! खड़े रहना, हिलना नहीं। इसकी मजाल थी कि हिल जाता अपनी जगह से।" संगठित और सोद्देश्य हिंसा असल में इकबाल का मामला है। हिंसा की सजेस्टिव पावर महत्वपूर्ण होती है। और, गाँधीजी की मजबूती की बात जब हम करते हैं तो बहुत सीधी सी बात हमारे सामने है, गाँधीजी की और लाखों असफलताओं की चर्चा की जा सकती है। गाँधीजी के बहुत सारे काम विवादस्पद रहे हों। इतने लम्बे सार्वजनिक जीवन में विवाद होना स्वाभाविक है लेकिन इस बात से तो संभवतः गाँधीजी का घोर विरोधी, घोर आलोचक भी इंकार नहीं करेगा कि गाँधीजी ने इंपीरियल पावर की हिंसा की सजेस्टिव ताकत को, उसके इकबाल को ख़त्म कर दिया। तोड़ दिया उन्होंने हिंसा की उस ताकत को…. 

उन्होंने (गाँधीजी) ने बारम्बार दो बातों को स्पष्ट किया है। एक, यह कि अहिंसा और कायरता पर्यायवाची नहीं हैं। कायरता की मूल प्रेरणा वस्तुतः वही है जो हिंसा की मूल प्रेरणा है। आक्रामकता किसी भी कीमत पर अपने आपको बचाये रखने की प्रेरणा से उत्पन्न होती है और इसी प्रेरणा से कायरता उत्पन्न होती है। जब आप दूसरे को ध्वस्त करके अपने आपको नहीं बचा सकते तो भाग करके अपने आपको बचा लें ! हिंसा इस अर्थ में कायरता की सहधर्मी है। हिंसा और कायरता परस्पर विरोधी नहीं हैं। हिंसा और कायरता परस्पर पूरक हैं। गाँधीजी गहरे में इस बात को जानते थे। बिलकुल ठीक जानते थे कि अहिंसा और कायरता पर्यायवाची नहीं हैं बल्कि दोनों परस्पर कतई विरोधी नैतिक मनोदशाएं हैं…. 

गाँधीजी की महत्ता इस बात में है कि यह सारी चीजें जो अधिक से अधिक व्यक्तिगत आदर्श के रूप में समाज से दूर, पहुंचे हुए महात्माओं की साधना के रूप में प्रचलित थीं, इन सारी चीजों को गाँधीजी ने एक व्यापक जनांदोलन का बुनियादी दार्शनिक आधार बना दिया। करुणा की बात गाँधीजी के पहले बहुत लोगों ने की है। संयम की बात गाँधीजी के पहले बहुत लोगों ने की है लेकिन करोड़ों लोगों से एक साथ मांग करने वाला व्यक्ति पहला था यह मोहनदास करमचंद गाँधी, जिसने करोड़ों लोगों से मांग की कि आप केवल परमात्मा के साथ नहीं बल्कि अपने साथी मनुष्यों के साथ, अपने साम्राज्यवादी शोषकों के साथ भी करुणा और संयम का सम्बन्ध रखें। गाँधीजी की अहिंसा इस अर्थ में अभूतपूर्व है। और इसलिए मैंने कहा कि यह उनकी केवल विनम्रता है। एक छोटे- मोटे विद्यार्थी के तौर पर, इतिहास और समाज और साहित्य के बारे में कुछ सोचने समझने वाले एक निहायत हकीर इंसान के तौर पर मैं महसूस करता हूँ कि गाँधीजी का यह कहना कि सत्य और अहिंसा शाश्वत हैं, बिलकुल सही है, लेकिन गाँधीजी की अहिंसा परंपरा से चली आ रही अहिंसा का विस्तार नहीं है वह उनकी मौलिक जीवन दृष्टि है। इस अर्थ में मौलिक जीवन दृष्टि है गाँधीजी की अहिंसा कि वह बुनियादी तौर से टिकी हुयी है करुणा और संयम पर। गाँधीजी के सारे जीवन को किताब की तरह पढ़ें, आजकल प्रचलित, फैशनेबल शब्दावली के मुहावरे में कहेँ कि एक टेक्स्ट की तरह पढ़ें तो उसका सबटेक्स्ट यही है, करुणा और संयम….

गाँधीजी का जीवन सफल हो या असफल उस पर फैसला देने का अधिकार कम से कम मुझे नहीं है। बड़े इतिहासकार, बड़े विचारक यह फैसला देंगे। लेकिन गाँधीजी का जीवन एक बहुत ही सार्थक प्रयत्न है हर तरह की मोरल डाईकॉटमी के पर जाने का और इस अर्थ में वह हम सबके लिए कम से कम मेरे लिए एक सतत प्रेरणा के भी स्रोत हैं और सतत चुनौती के भी। मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो यह मानें कि मैं गाँधी नहीं हो सकता लेकिन कम से कम इतना तो जान ही सकता हूँ कि किसी भी मनुष्य की तरह मेरे भीतर सतत उपस्थितियाँ हैं एक गाँधी की, एक गोडसे की। और सतत चुनौती है सही चुनाव की। सही जगह खड़े होने की। गाँधीजी के शब्दों में सत्य का आग्रह करने की। गाँधीजी ने सत्याग्रह को पारिभाषित किया था, सत्याग्रह का मतलब ही है कि अपने घोर विपक्षी के सत्य में भी, उसकी सम्भावना में भी आस्था रखना। इस बात में आस्था कि किन्ही कारणों से कोई व्यक्ति कितना भी पतित क्यों न हो गया हो, अंततः घोर पतित, घोर पापी, घोर हिंसक मनुष्य भी मनुष्य है। और जब तक उसकी मनुष्यता है तब तक संभावना है...

उस निपट मानव को, जैनेन्द्र के शब्दों में, उस "निपट मानव" को अपने भीतर खोजना, उस मजबूती को इसका एक नाम गाँधी है, वो मजबूती जो हमे इस बात की लगातार याद दिलाती है, हम उस याद को सुन पाएं या न सुन पाएं, गाँधीवादी मुहावरे में कहें तो परमात्मा की आवाज़ जो मेरे, आपके, सबके मन में कहीं न कहीं कौंधती है। बिना संयम और करुणा के मैं मनुष्य नहीं हो सकता। वह आवाज़ जो हम सबके मन में कौंधती है और हमें प्रेरित करती है, विवश करती है कि हम सही वक़्त पर सही फैसला करें। हम कर नहीं पाते वह एक अलग मसला है लेकिन वह संभावना सदा बनी रहती है। वह संभावना जिसका नाम मजबूती है और दूसरा नाम महात्मा गाँधी....              
    


8 January 2015

हिंदू राष्ट्रवाद कितना व्यावहारिक



शीतला सिंह 
जनसत्ता, २६ दिसंबर २०१४ 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कोलकाता की एक सभा में विपक्ष को चुनौती दी कि वह धर्म परिवर्तन पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून के प्रस्ताव का समर्थन करे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जो व्यक्ति हिंदू धर्म से भटका है, उसे पुन: वापस लाइए। पड़ोसी पाकिस्तान भी भारत भूमि है, जो 1947 के निर्णय के बावजूद अलग देश बना था, जो स्थायी नहीं है। जो हिंदू धर्म में नहीं आना चाहते, वे हिंदुओं का धर्म परिवर्तन भी कराएं। उन्होंने भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की कल्पना का भी समर्थन किया।
जहां तक धर्म का संबंध है, वह वैयक्तिक आस्थाओं से जुड़ा हुआ प्रश्न है। कोई व्यक्ति अपनी आस्था, विश्वास के साथ ही सोच और विवेक पर आधारित धर्म स्वीकार करना चाहता है तो उस पर संवैधानिक दृष्टि से कोई पाबंदी नहीं है। आस्था और विश्वास को व्यक्ति का मूल अधिकार माना गया है और चूंकि धर्म की स्वीकृति और व्यक्ति को निर्णय करने का अधिकार वयस्क होने के बाद ही प्राप्त होता है इसलिए धर्म की बाबत उसकी स्थिति भी तभी तय की जानी चाहिए। यह तय करने का अधिकार, किसी और को नहीं, खुद उस व्यक्ति को है।
अभी तो स्थिति यही है कि किसी मां-बाप से पैदा होने वाले बच्चे को उसी धर्म का अवलंबी मान लिया जाता है जबकि यह सोच और विवेक पर आधारित नहीं बल्कि जन्म आधारित है। कोई बच्चा कब, कहां किसके यहां जन्म लेगा यह उसकी इच्छा पर आधारित नहीं होता, क्योंकि जन्म जिस प्रक्रिया पर आधारित है उसमें पैदा होने वाले की इच्छा शामिल नहीं है। उसकी मान्यता और विश्वास पर मुहर तभी लग सकती है जब वह बालिग हो।
दुनिया में जितने भी धर्म आए उन्हें स्वीकार करने वाले शिशु नहीं, वयस्क लोग ही थे, जिसमें उनके वंश का कारवां भी शामिल मान लिया गया है। यह प्रक्रिया सभी धर्मों की मान्यताओं में समान रही है इसलिए सोच, विचार, चिंतन और विवेक के आधार पर किसी व्यक्ति को किसी धर्म को स्वीकार करने से रोका नहीं जा सकता। लेकिन यह लोभ, डर, भय, दबाव पर आधारित नहीं होना चाहिए, क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो उसे स्वेच्छाजन्य और विवेकजन्य नहीं माना जाएगा।
धर्म को अधिकृत रूप से स्वीकार करना वयस्कता प्राप्त करने के बाद ही हो सकता है। इसीलिए जो वयस्क नहीं है वह धर्म परिवर्तन का भी पात्र नहीं है। विचारों में कब और कैसे बदलाव आए, इस पर भी कोई पाबंदी नहीं लग सकती, क्योंकि हम जिसे आज सही मान रहे हैं, कल हमारी चेतना के विस्तार और तथ्य तथा ज्ञान के फलस्वरूप उसमें बदलाव सकता है। यह ऐसा प्रसंग है जिसे भय और दबाव से मुक्त होना ही चाहिए।
हिंदू समुदाय जो जाति, धर्म, मान्यता और पूजा पद्धति के आधार पर बंटा हुआ है, जिसमें विभिन्न मान्यताओं के लोग शामिल हैं, जिन्हें हिंदू कहते हैं उनमें एकता के आधार जब न्यायालय द्वारा भी ढूंढे जाने लगे तो कोई ऐसा एक आधार नहीं मिला जिससे यह पहचान की जा सके। इसलिए उसे कहना पड़ा कि जो अपने को हिंदू कहता है वह हिंदू है, क्योंकि खाना-पीना, उठना-बैठना, शादी-विवाह के साथ ही वंश, गोत्र आदि की भिन्नताएं भी तो हैं। हिंदुओं में कुछ लोग एक वर्ग को अस्पृश्य बताते थे, उन्हें छूना भी नहीं चाहते थे, खाना-पीना, शादी-विवाह आदि संबंधों की तो बात ही अलग है।
इसी मान्यता के आधार पर कि जो लोग किसी अन्य धर्म के नहीं हैं वे सारे ईश्वरवादी और अनीश्वरवादी, विभिन्न मान्यताओं के अनुयायी और क्षेत्रीय आधार वाले हिंदू बन गए। अगर इन सभी को वास्तव में एक किया जा सके तो यह बहुत बड़ा लक्ष्य है जिसकी पूर्ति आसान नहीं है।
भागवत अगर भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं तो उन्हें राष्ट्र की परिकल्पना के साथ ही उसका विश्लेषण भी करना होगा। जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति आदि एकता के वे कौन-से आधार हो सकते हैं, उनकी खोज भी करनी पड़ेगी। भागवत बौद्ध, जैन, सिख आदि को भी हिंदू ही मानते हैं लेकिन उन्हें यह भी बताना होगा कि इसी देश में बौद्धों और जैनों के खिलाफ अभियान चला था, जबकि ये दोनों धर्म इसी भूमि पर जनमे और विकसित हुए। वे दुनिया भर में तो फैले लेकिन उनसे मुक्ति का अभियान भी इसी देश में चला जिसमें हिंसा से परहेज नहीं था। आज उनके बहुत-से पूजास्थलों पर उनका कब्जा नहीं है।
अयोध्या में पुष्यमित्र शुंग ने जो अंतिम यज्ञ किया था, उसकी घोषणा यही थी कि अगर कोई एक बौद्ध का सिर लाकर देगा तो उसे सोने का दीनार पुरस्कार दिया जाएगा, यानी बौद्ध-विहीनता का अभियान पूरा हो गया। यह कहा जा सकता है कि स्थितियां बदली हैं लेकिन उनकी स्वीकार्यता के कारण भी पैदा हुए हैं। दलित नेता डॉ भीमराव आंबेडकर ने नागपुर में बौद्ध धर्म स्वीकार करने की दीक्षा ली थी, लेकिन वे सभी दलितों और आदिवासियों को इसे स्वीकार नहीं करवा पाए।
बहुदेवतावाद इतने व्यापक रूप से फैला हुआ था कि आज भी इसके अनंत रूप विद्यमान हैं। इसलिए जब संघ की आनुषंगिक संस्था विश्व हिंदू परिषद बनी तो उसकी स्वीकार्यता सारे भारत में समान रूप से नहीं हो पाई। वह हिंदीभाषी क्षेत्रों में तो अपना प्रभाव जमा सकी लेकिन अन्य क्षेत्रों में विफल रही। इसलिए अब हिंदू राष्ट्र के पहले हिंदुत्व को परिभाषित करने का काम भी संघ परिवार और उसके नेता को करना पड़ेगा, और सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे अन्य ने कितना स्वीकार कर लिया।
आज नरेंद्र मोदी इस देश के प्रधानमंत्री हैं क्योंकि उन्हें पांच सौ तैंतालीस सदस्यों वाली लोकसभा में दो सौ बयासी सीटें प्राप्त हुई हैं। लेकिन देश के जिन आधे लोगों ने मतदान में भाग ही नहीं लिया, उन्हें क्या माना जाएगा? मोदी को चुनाव प्रणाली का लाभ तो मिला ही, जिसमें मतों के विभाजन का लाभ बड़े समूह को मिल जाता है, लेकिन इसी चुनाव में साठ प्रतिशत से अधिक लोगों ने उन्हें अस्वीकार भी किया है। हालांकि वे हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्व के मुद््दे पर चुनाव नहीं लड़ रहे थे। इसलिए भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की इच्छा तो हो सकती है लेकिन उस पर जनता की मुहर भी तो लगवानी पड़ेगी।
मुसलमान और ईसाई इसके लिए कैसे राजी होंगे? फिर, हिंदुओं में भी सबके सब लोग राष्ट्र के संबंध में संघ की परिकल्पना को कैसे स्वीकार कर पाएंगे? पंजाब में अकाली दल उनका सहयोगी है लेकिन सिख अपने को हिंदू नहीं बल्कि इतर धर्मी बताते हैं। सिख आतंकवाद के जन्म का आधार भी अलग राष्ट्र की परिकल्पना वाला ही था जो सफल नहीं हो पाया। इसलिए भागवत और उनके सहयोगी का बहुत पुराना सपना जो केंद्र में अकेले अपने बूते पर सरकार बनाने का था वह एक सीमा तक ही सफल हो पाया है क्योंकि आज भी उनका दूसरे सदन यानी राज्यसभा में बहुमत नहीं है। साथ ही संविधान की उन धाराओं में परिवर्तन की राह भी आसान नहीं दिख रही है, जिसके लिए राज्य विधानसभाओं के समर्थन की आवश्यकता होती है। वे अपने सहयोगी जो धर्म के प्रश्न पर उनके साथ हैं, यानी शिवसेना को महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव के लिए भी साथ नहीं जोड़ पाए।
जहां तक धर्म परिवर्तन का संबंध है, इस मूल अधिकार पर पाबंदी लगाना संभव नहीं है। लेकिन जिस प्रकार सांप्रदायिकता का प्रचार इसके लिए किया जा रहा है, वह भी तो संवैधानिक दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है। जब वे यह चुनौती देते हैं कि धर्म परिवर्तन पर प्रतिबंध का कानून बनना चाहिए तो उनके मन का डर ही सामने आता है कि अब जिसे वे हिंदू कहते हैं और अपने गले नहीं लगा पाए हैं उस विलगाव को कैसे रोका जा सकेगा? इन प्रश्नों पर प्रधानमंत्री को भी अपने विचार व्यक्त करने चाहिए क्योंकि भागवत के विचारों को चुनाव में उन्होंने किसी स्तर पर स्वीकार करने का दिखावा भी नहीं किया था। उन्होंने यह भी नहीं कहा था कि दलितों या अस्पृश्यों के खिलाफ उनके धर्मग्रंथों में विद्यमान टिप्पणियों को वे स्वीकार या अस्वीकार करते हैं या उन्हें वे किस दृष्टि से देखते हैं।
अगर धर्म ही संयोजक तत्त्व होता तो मुसलिमों में बिखराव की प्रवृत्ति क्यों दिखती? अपने को अलग पहचान के नाते अलग राष्ट्र बताने वाले पाकिस्तान का निर्माण 1947 में हुआ, लेकिन 1971 में पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश के नाम से परिवर्तित हो गया। फिर एकता की संभावनाएं नहीं दिखीं।
सत्तावन देशों में इस्लाम फैला हुआ है, कई देशों में वैचारिक, भाषाई और सांस्कृतिक एकरूपता भी है लेकिन वे एक राष्ट्र के रूप में परिवर्तित नहीं हो पाए। आतंकवाद भी पनपा और अपनों के ही संहार में सहायक हुआ।
अभी हाल में पेशावर में सैनिक स्कूल के बच्चों की हत्या पर सारी दुनिया ने शोक जाहिर किया। इन हत्याओं को तहरीक--तालिबान पाकिस्तान ने अंजाम दिया। दुनिया के किसी भी कोने से उसकी इस करतूत को समर्थन नहीं मिला। कई सारे मुसलिम देशों में आपसी द्वंद्व भी विद्यमान है। इन देशों में लड़ाई-झगड़े खुद को इस्लाम के असली धर्मावलंबी बताने वाले ही कर रहे हैं।
कट्टरवादी धार्मिक और अपने को शुद्ध इस्लामिक सैनिक बताने वाले ही सबसे अधिक इस्लामी देशों और उनके नागरिकों का संहार कर रहे हैं। यही हाल ईसाई, बौद्ध और अन्य धर्मों का भी है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि हिंदू राष्ट्रवाद वास्तव में एकता और सद््भाव का प्रतीक हो जाएगा और विभिन्न स्वार्थों पर आधारित झगड़े समाप्त हो जाएंगे। धार्मिक आधार पर वैचारिक भिन्नता को रोका नहीं जा सकता। हिंदुओं में यह कभी संभव नहीं हो पाया। चौदह सौ वर्ष पहले जिस इस्लाम का जन्म हुआ वह बहत्तर खेमों में बंट चुका है। यह संख्या कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। इसलिए भागवत का हिंदू राष्ट्रवाद का नारा व्यावहारिक है उच्चतर आदर्शों से प्रेरित। 

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