27 February 2015

नौजवान का रास्ता

Image result for muktibodh

गजानन माधव मुक्तिबोध 

(क्रांतिकारी लेखक मुक्तिबोध ने 1952 में नौज़वानों को केंद्र में रखकर 'नया खून' का सम्पादकीय लिखा था, जिसमें उन्होंने नौज़वानों को सही दिशा देने के लिए अनेक बिन्दुओं की तरफ ध्यान दिलाया था. उनके लिखे इस सम्पादकीय का जितना महत्व उस समय था उससे कहीं ज्यादा आज है. उनका कहना था कि "जो समाज और राज्य नौजवानों को सतत उन्नतिशील पेशा नहीं दे सकता वह राज्य और वह समाज टिक नहीं सकता। इतिहास के विशाल हाथ इस वक्त उसकी क़ब्र खोदने के लिए बड़ा भारी गड्ढा तैयार कर रहे हैं।" मुक्तिबोध की लिखी यह पंक्तिया आज के सन्दर्भ में अक्षरशः लागू होती दिख रही हैं. मौजूदा राज्य व्यवस्था और युवाओं की मनःस्थिति को केंद्र में रखते हुए आज इसे फिर से पढ़े जाने (नौजवानों के लिए खासकर) की जरूरत है. मुक्तिबोध की इस सम्पादकीय को नेमिचन्द्र जैन ने "नौजवान का रास्ता" शीर्षक दिया था, जिनने मुक्तिबोध रचनावली का संपादन किया है. "स्वाधीन" के पाठकों के लिए रचनावली के खंड-6 से यह सामग्री साभार दी जा रही है...)

पहाड़ों को तोड़कर, चट्टानी दीवारों को काटकर, कगारों को ढहाकर, गूँजकर और गुँजाकर, पहाड़ी क्षेत्र की धड़कन बनकर, जो आगे बढ़ रहा है उसी को अपनी भाषा में झरना कहते हैं। यही झरना ज़रा दूर चलने पर पहाड़ी नदी बन जाता है। इस नदी के जलनार्द की खोज करने पर पता चलता है वहाँ एक प्रपात है, धुआँधार है, जलधूम है।

अन्वेषक निकलते हैं। रिसर्च के विद्यार्थी निकलते हैं, इंजीनियर्स निकलते हैं। उस स्थान की खोज करते हैं। प्रपात तक रास्ता बनाते हैं, उस पहाड़ी नदी की शक्तिशाली धारा की ताक़त को बिजली की ताक़त में रूपान्तरित करने के लिए एक बिजलीघर बनाया जाता है। वैज्ञानिक अनुसन्धानकर्ता, कार्यकर्ता, कारीगर, कर्मचारी और कलाकार और मज़दूर सभी इकट्ठा हो जाते हैं। दूरवर्ती क्षेत्रों में सस्ती बिजली के ज़रिये सिंचाई होती है, कारख़ाने चलते हैं और देश की धन-धान्य समृद्धि बढ़ती जाती है। कवि और उपन्यासकार बिजलीघर के श्रमशील जीवन के चित्र उभारते हैं, उन्हें गाते हैं। पिछड़ा हुआ मुल्क उन्नति के इतिहास के मार्ग पर दनदनाता हुआ आगे बढ़ जाता है। अगर नौजवानी की ताक़त को पहाड़ी नदी की शक्ति मान लिया जाय, तो यह निश्चित है कि नौज़वान के दिलोदिमाग की ताकत को, ज्ञान और बुद्धि तथा कर्म निश्चय की बिजली में रूपान्तरित करते हुए, देश-निर्माण यानी मानव-निर्माण की ऊँची-से-ऊँची मंज़िल तक पहुँचाया जा सकता है, बंजर परती ज़िन्दगी में इश्क़ और इन्क़लाब की रूहानियत की फसल खड़ी की जा सकती है।

ज़िन्दगी बड़ी ही ख़ूबसूरत चीज़ है, वह जीने के लिए है, मरने के लिए नहीं। अच्छे आदमी क्यों दुख भोगें – इतने नेक आदमी और इतने अभागे! दुनिया में बुरे आदमियों की संख्या नगण्य है, अच्छे आदमियों के सबब ज़िन्दगी बहुत ही ख़ूबसूरत चीज़ है, वह जीने के लिए है, मरने के लिए नहीं।लेकिन नौजवानों के दिलोदिमाग़ की ताक़त को बिजली में रूपान्तरित करते हुए, देश-निर्माण और मानव-निर्माण में लगाने के लिए, जिस बिजलीघर की ज़रूरत होती है, वह हिन्दुस्तान में नदारद है। अब देश की उन्नति हो तो कहाँ से हो और कैसे हो। जिस देश में नौजवान मारे-मारे फिरते हैं, बेकार रहते हैं, भूखों मरते हैं (बौद्धिक और हार्दिक विकास के लक्ष्य ही जहाँ गुम हैं) तो उस देश के नौजवान अगर अपनी ख़ाली जेब और भूख की यन्त्रणाओं को, अपने दुर्भाग्यों को, चवन्नी-छाप एक्ट्रेसों की सूरत देखकर दो मिनट के लिए भुलाना चाहता हो, तो उस नौजवान की तृषित आँखों को लोग भले ही ग़लत समझें, हम उनके बारे में किसी ग़लतफ़हमी में नहीं हैं, क्योंकि हमारा नौजवान बेहद सच्चा है। और बेहद अच्छा है। उसमें बड़ी आग है और बहुत मिठास है। वह दुनिया को उलट सकता है और उलटकर फिर पलट सकता है। लेकिन उसके दिलोदिमाग़ की ताक़त को मानवी बिजली में रूपान्तरित करने वाला बिजलीघर कहाँ है? वह तो नदारद है। इसलिए अगर हमारे नौजवान में कुछ दोष है, कुछ खामियाँ हैं तो अपराध उसका नहीं है। क्योंकि हमारा नौजवान बहुत सच्चा है और बेहद अच्छा है।

नौजवानी के गीत बहुत लोगों ने गाये हैं। हुस्नोइश्क़ और इन्क़लाब का क़ाबा नौजवानी ही समझी गयी है। लेकिन जिन तकलीफ़ों में से नौजवान गुज़रता है, उनके बारे में क़लम चलाने का साहस थोड़े ही लोगों ने किया है। यथार्थ कुछ और है, और काल्पनिक लोक कुछ और। माना कि साधारण रूप से नौजवान अपने बाप के घर रहता है, बड़ों की छत्रछाया में पलता है। और दुनिया से लोहा लेने का जोश और उमंग उसमें भले ही रहे, उसके पास अनुभव न होने के कारण उसे पग-पग ठोकर खाना पड़ता है।

यह बात न भूलनी चाहिए कि वर्तमान स्थिति में जबकि पारिवारिक चिन्ताओं का वातावरण घर में ख़ूब घना हो जाता है, और क़ायम रहता है, हमारा साधारण नौजवान उन्नति की ओर अग्रसर नहीं हो सकता। नौजवानी में ज़िन्दगी को पंख फूटते हैं। लेकिन ठीक उसी समय घर का चिन्ताग्रस्त वातावरण उसके मन पर छा जाता है। एक ओर उमंगें और जोश लहरें मारता है, तो दूसरी ओर ठीक उसके विपरीत नौजवान के हृदय में चिन्ता और घर की उलझनें पुराने अभिशाप की छायाएँ-सी चक्कर लगाती हैं।

पुराने शहीदों का नाम लेकर, भगत सिंह और सुभाष बोस की कीर्ति-कथा सुनाकर, गदर पार्टी और अनुशीलन दल की यशोगाथा सुनाकर, नौजवान के दिल में देशभक्ति और प्रेरणा तो ज़रूर भरी जा सकती है, लेकिन उन कथाओं के ज़रिये उसकी अपनी उलझनों को दूर नहीं किया जा सकता है। हर पीढ़ी के अपने नये अनुभव होते हैं, इस प्रकार नये, कि जो न पुरानी पीढ़ी के थे और न आगामी पीढ़ी के होंगे। फलतः नसीहतों की झाँझ बजाकर नौजवान की समस्या को हल नहीं किया जा सकता। सहानुभूति और मानवीय अनुभवमूलक ज्ञान की आवश्यकता अगर कहीं सबसे ज़्यादा पड़ती है, तो वह नौजवान के दिल को समझने में। नौजवान में श्रद्धा का जो आवेग होता है, हृदय की जो तेज़ निगाहें होती हैं, उन पर जिन्हें आप ज़िन्दगी के तज़ुर्बात कहते हैं। (यानी सांसारिक दृष्टि) उसकी धूल भरी परतें नहीं छायी रहतीं। फलतः, नौजवान यदा-कदा आपको, अपने अनुभव के कारण, मूरख प्रतीत हो सकता है। लेकिन यही उसकी अच्छाई है। जो नौजवान 19-20-21 साल में ही बूढ़ों की खूसट सांसारिक आँखों से ही दुनिया को देखने लगता है, समझ लीजिये कि उसमें साहस की प्रवृत्ति, नये अनुभव प्राप्त करने की जिज्ञासा और क्षमता, तथा जीवन के नव-नवीन उन्मेष का नितान्त अभाव है। ऐसा नौजवान नायब, तहसीलदार या आई.ए.एस. हो सकता है, लेकिन वह देश के किस काम का।

वर्तमान स्थिति यह है कि नौजवानों के गीत गाने से दिल भले ही हलका हो जाये, दिमाग़ साफ़ नहीं हो पाता, रास्ता नहीं मिल पाता। नौजवानों की कठिनाइयों का एक विशेष स्वरूप होता है। सिर्फ़ यह कह देने से कि ‘बढ़े चलो बहादुरो, रवाँ-दवाँ बढ़े चलो’ कुछ नहीं होता, हर नौजवान को अपना रास्ता तय करना होता है। और वह उस रास्ते के मोड़ और गड्ढों के बारे में जानकारी चाहता है, लेकिन हमारे छायावादी इन्द्रधनुषी काव्य की नौजवानी बादलों में ही ले जाती है, ज़मीन पर फैला हुआ रास्ता नहीं बतलाती।

नौजवान का रास्ता! कितना कठिन प्रश्न है यह! हमारे उपन्यासों ने कभी इस प्रश्न पर प्रकाश नहीं डाला!! हमारे साहित्य ने कभी तत्सम्बन्धित मार्गदर्शन नहीं किया। हमारे बड़े-बूढ़े, हमारे आदरणीय बुज़ुर्ग, नौजवान के सामने ‘नौकरी करो, पैसा लाओ’ का नारा बुलन्द करते हैं। और नौजवान भी यह चाहता है कि उसकी पारिवारिक प्रतिष्ठा को चार चाँद लगें। लेकिन बेचारा!! लेकिन, उसका सच्चा दिशा-दर्शन किसने किया है!! किसमें वह ताक़त है कि जो उसके जोश, उत्साह और उमंगों का भार अपने हृदय में झेल सके, उसके आदर्शवादी प्रेम और त्यागभरी श्रद्धा के समस्त अभिप्रायों को समझ सके! उन्हें अपने में रख सके! बहुत कम ऐसे लोग होते हैं, जनाब, जिनमें यह ताक़त, यह फौलादी सीना है। उम्र बढ़ने के साथ ही आदमी समझौते को बुद्धिमानी और प्रतिभा का नाम देता है। लेकिन नौजवान मूलभूत प्रश्न उठाता है!! और उसके जवाब!!

पत्रकार और साहित्यिक, कवि और राजनीतिक, अपने अस्तित्व को निर्णयकारी समझते हैं – मानो कि दुनिया पर वे निर्णय देने जा रहे हों। अपनी काल्पनिक अदालत में फ़ैसले देते रहना एक बात है। सही-सही रास्ता बताना – और जिसको रास्ता बताया जा रहा है, उसके सहचरत्व को स्वीकार करना – एक दूसरी बात है। इस लेख का लेखक एक मामूली आदमी है। अपनी बीती हुई जवानी से सिर्फ़ उसने सबक सीखे हैं – उस नौजवानी के तकाजे़ उसके सामने आज भी ज़िन्दा हैं। उनके सवालात आज भी उसको पुकारते हैं – फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि घुटने फोड़ने वाली ठोकरें आज उसे पहले सलाम करती हैं, फिर पेंच लड़ाती हैं। तो ऐसे मामूली आदमी के पास इतनी बड़ी हिमाकत नहीं है कि वह नयी पीढ़ी के नौजवानों (जिनके अपने नये तज़ुर्बात है) (को) सीख दे सके।

लेकिन इतना कहकर बात ख़त्म हो सकती है, मामला ख़त्म नहीं होता। सवाल का जवाब कभी-कभी सवाल से दिया जाता है। इसलिए हम कुछ ऐसे सवालों का सिलसिला अपनायेंगे, जिनसे हम हिन्दुस्तान की जनता के अपने तकाजों को समझ सकें, इसलिए कि हमारा नौजवान भारतीय जनता का ही एक अंग है।

परिवार समाज की इकाई है, चाहे वह रूसी समाज हो या चीनी, हिन्दुस्तानी हो अथवा ब्रिटिश। अगर हमारे परिवार में असन्तोष, विक्षोभ, अन्याय, भूख और दरिद्रता होगी तो निश्चय ही उनका असर नौजवान की मनोदशाओं और प्रवृत्तियों पर होगा। हमारे नौजवानों में जो आज छिछली रोमानी प्रवृत्ति, घुमक्कड़पन, ग़ैरज़िम्मेदाराना बर्ताव, ख़ास तरह का फक्कड़पन, पलायनशीलता, आदि दुर्गुण उत्पन्न होते हैं, तो इन प्रवृत्तियों का मूल हमारे परिवार में छाये व्यापक असन्तोष में निहित है। किन्तु बहुत-से विचारक, स्वयं नौजवान भी, इन प्रवृत्तियों का मूल कारण मानसिक बतलाते हैं, या सोचते हैं, सो ग़लत है।

अगर नौजवान को सही रास्ता मिलता जाये, अपनी उन्नति और विकास के नये-नये क्षेत्र मिलते जायें, और उसको हमेशा यह प्रतीत होता जाये कि उसकी अपनी उन्नति का कार्य सामाजिक उन्नति का कार्य है अथवा दूसरे शब्दों में, सामाजिक क्षेत्र में उसके अपने जीविका-सम्बन्धी कर्तव्य का कार्य सामान्यतः और विशेषतः सामाजिक कर्तव्य भी है, कि जिसके न करने से जनता की हानि होगी, और जिसको सुचारू रूप से करने से जनता का कल्याण और सामाजिक विकास होगा; अगर उसे हमेशा यह प्रतीत होता जाये कि सामाजिक ढाँचे के अन्तर्गत उसकी उपेक्षा नहीं की जा रही है, नहीं की जा सकती है – तो निश्चय ही वह दुगुने रूप से अपना कार्य करेगा और अपनी नौजवान मांसल भुजाओं और चौड़ी छाती की ताक़त से बंजर को उपजाऊ बना देगा।

लखनऊ विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के आचार्य डाक्टर डी.पी. मुखर्जी ने रूस से लौटकर अपनी एक मुलाक़ात में यह बताया कि उस देश के नौजवान को अपना पेशा चुनने में कोई तकलीफ़ नहीं होती। साधारण रूप से अपनी आयु के 16-17वें साल में ही वह अपना जीवन-कार्य निश्चित कर चुकता है। बीस-बाईस तक आते-आते वह अपने कार्य में इतना कुशल हो जाता है कि साधारण रूप से उसके जिम्मे ऊँचे-ऊँचे कार्य कर दिये जाते हैं। जो लोग बुज़ुर्ग हो जाते हैं वे सिर्फ़ ‘चेकअप (जाँच) करते रहते हैं कि कार्य की तादाद और गुण कहीं कम तो नहीं हुआ है, और चूँकि पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत हर वर्ष की और हर तीन माह की योजना बनती रहती है (और साधारणतः योजना में बतलाये कार्य की तादाद से ज़्यादा काम करने का हौसला हर एक रखता है) इसलिए हर योजना में पिछली योजना से ज़्यादा काम रहता है और इस निश्चित किये गये ज़्यादा काम से ज़्यादा काम करने का हौसला नौजवान पूरा कर पाता है या नहीं और अगर नहीं कर पाता है तो उसकी कौन-सी दिक़्क़तें हैं, कौन-सी कठिनाइयाँ हैं, उसकी पूर्ति के लिए उन्हें कौन-सी सुविधा की ज़रूरत है – यह देखने का कार्य अनुभवी बुजुर्गों, विशेषज्ञों और अन्य प्रतिभाशाली लोगों का होता है, जो ख़ुद दुगुने ज़ोर से काम करते रहते हैं कि वे नौजवानों के सामने अपना उदाहरण रख सकें।

हिन्दुस्तान जैसे देश में–जहाँ अनन्य भूमि है, रत्नगर्भा धरित्री है और उर्वर वसुन्धरा है, निरभ्र आकाश है, भव्य गम्भीर मेघराज हैं और उत्तरस्थ हिमालय नगाधिराज है, विद्युत-शक्ति जल-शक्ति भूमि-शक्ति है – उस देश में अगर नौजवान के छाती की हड्डियाँ निकल आयें, चप्पल की कीलें पैर में लगातार छेद कर रही हों, चेहरे के बाल बढ़े हुए हों और अगर वह एक पैसे की दो बीड़ी पीता हुआ किसी लड़की के मुखड़े को देख सिनेमा का एकाध फोश गाना गुनगुना उठता हो, तो उसके दिल की कभी भभकती हुई तो कभी फफकती हुई तमन्नाओं के ज्वार को देख हमें गुस्सा नहीं आता। उस पर गुस्सा करने वालों पर गुस्सा आता है। बल्कि उन शक्तियों की कमर तोड़ने की इच्छा होती है, उन काली ताक़तों को हमेशा के लिए जमीन में गाड़ देने के लिए भुजा ऊँची उठ जाती है, जिन्होंने मनुष्यता के रत्नों, इन नौजवानों, को इस तरह पीस डाला है।

हमारे साधारण ग़रीब मध्यम-वर्गीय नौजवान–जो पढ़ा-लिखा है–को भी अपना पेशा चुनने में बहुत बड़ी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है। साधारण रूप से पेशा उसके मनोनुकूल होता ही नहीं, पेशे में उसकी उन्नति भी नहीं होती! किसी से पूछिए, ‘आपका क्या हाल है?’ जवाब मिलता है, ‘बस घिसट रहे हैं!!’ और फिर वही फीकी मुद्रा!!

इसका मतलब यह नहीं कि ज़िन्दगी हँसती नहीं। नहीं–वह अपने रोने में हँस पड़ती है। ठीक वैसे ही जैसे बरसती बदली में से चमचमाता सूरज निकल पड़ता हो!! वह तो रूह है जो खिलखिला उठती है!! और सिर्फ़ इसी रूहानी ताक़त से, अनेक बाधाओं के बावजूद, ज़िन्दगी चलती जाती है। अगर इस रूहानी ताक़त को डायनमो समझा जाय तो यह कहा जा सकता है कि ठेले के चारों चक्के गायब हैं और सिर्फ़ डायनमो चल रहा है। साफ है कि डायनमो चक्कों की सहायता के बिना अकारथ है, बेमानी है।

जो समाज और जो राज्य नौजवानों को सतत उन्नतिशील पेशा नहीं दे सकता, वह राज्य और वह समाज टिक नहीं सकता। इतिहास के विशाल हाथ इस वक्त उसकी क़ब्र खोदने के लिए बड़ा भारी गड्ढा तैयार कर रहे हैं।

ठीक यह दशा शिक्षा की भी है। महँगी शिक्षा का मतलब ही यह है कि ग़रीब अशिक्षित रहे। साधारण मध्य-वर्गीय शिक्षित रहें, किन्तु ऊँची शिक्षा प्राप्त न करें ओर विशेषज्ञ न हों। सिर्फ़ ऊँचे घरानों के लोग ही सिद्धहस्त विशेषज्ञता प्राप्त करें, जिसके लिए वे ब्रिटेन जायें, अमेरीका जायें!
यह देखी-मानी बात है कि साधारण मध्यवर्गीय और अन्य ग़रीब वर्ग में ईमानदार और प्रतिभाशाली, जिज्ञासु और कार्योत्सुक, दुर्दमनीय और त्याग के लिए आकुल नौजवानों की कमी नहीं है, जिनकी मेधा, जिनकी प्रतिभा, जिनकी सूक्ष्म-दृष्टि, जिनका धीरज और जिनकी गम्भीरता किसी सर्वोच्च देश के नौजवानों से बराबरी का मुकाबला कर सकती है। यहाँ हम बक नहीं रहे हैं। बहैसियत एक तजुर्बेकार और जानकार आदमी के हम यह मान्यता आपके सामने रख रहे हैं।

फिर क्या कारण है कि हमारे इन नौजवानों को अच्छी तालीम नहीं मिल पाती? क्या इन पंक्तियों का लेखक और उनका पाठक (दोनों) कुछ हद तक इस बात के दोषी नहीं हैं कि उन्होंने अब तक तालीम की माँग का नारा बुलन्द नहीं किया?
साक्षरता-प्रसार, समाज-शिक्षा, तालीम का स्थान नहीं ले सकते। तालीम के अन्तर्गत अपने पेशे का सिर्फ़ ज्ञान ही नहीं आता, वरन दुनिया के सभी मुख्य-विषयों की अच्छी-ख़ासी जानकारी भी सम्मिलित है। आज जिस प्रकार की शिक्षा हमारे नौजवानों को दी जा रही है, वह एक तो महँगी है और दूसरे, सिर्फ़ उसी वर्ग के नौजवानों के लिए है जो शासक वर्ग के समर्थक या समर्थकों के समर्थक धनी अथवा उच्च मध्यम-वर्गीय परिवारों में से आते हैं।

श्री राजगोपालाचारी मध्यम-वर्ग के सम्बन्ध में लिखते हुए यह कहते हैं कि इस वर्ग में साहस का अभाव है, वह बाबूगीरी पसन्द करता है। वे सलाह देते हैं कि जिन पेशों को नीचा समझा जाता हे, वे वस्तुतः वैसे हैं नहीं। पेशा नीचा या ऊँचा नहीं होता। मध्यम-वर्ग को चाहिए कि वे नीचे पेशों को भी स्वीकार करें।

नसीहत और बेमाँगी सलाह देने वाले कांग्रेसी उस्तादों को यह मालूम नहीं कि अगर मध्यम-वर्गीय लोग बाबूगीरी ही करते हैं तो इसका बहुत कुछ कारण पुश्तैनी है। चमार का लड़का चमार, बनिये का बनिया और क्लर्क का लड़का क्लर्क, अपने पेशे के संस्कारों को लेकर आगे आता है। ये संस्कार उसकी कार्यक्षमता में सहायक होते हैं। और अगर उसका पुश्तैनी पेशा छुड़ा ही देना है तो क्या उसे नयी तालीम की ज़रूरत नहीं है? और फिर, बाबूगीरी छोड़कर अगर वह चमारी का धन्धा करने लगे तो क्या चमारों पर आफत न आयेगी? अगर वे खेती करने लगें तो क्या भूमि पर जीविका चलानेवालों की लातादाद संख्या में बढ़ती न होगी? लेकिन राजगोपालाचारी को तो नसीहत देना है, समस्या को सुलझाना थोड़े ही है!!

ध्यान रहे कि सिर्फ़ पेशा चुनने में और उसमें कार्य-कुशलता प्राप्त करने में हमारे नौजवान की सारी ताक़त ख़र्च हो जाती है। वह जल्दी ही बुड्ढा हो जाता है। चिन्ता-व्यथा उसके भाग्य में लिखी हुई जैसी लगती है। वह ऊपर से चाहे जितना हँसता रहे, उदासी घेरे रहती है। किन्तु केवल उदासी ही उसको नहीं घेरती। हमारा नौजवान अब यह पूरे तौर से समझ चुका है कि जब तक वर्तमान शासक-वर्ग और उसकी कार्य-नीति, शोषण परम्परा और उसका दमन-चक्र चलता रहेगा, तब तक उद्धार नहीं। वह यह भी समझ चुका है कि जनता के सम्पूर्ण उद्धार के बग़ैर उसका उद्धार भी असम्भव है।
लेकिन ज़माने-भर को गाली देने से, मात्र सामाजिक आलोचना से, व्यक्ति अपने को बुद्धिमान भले ही घोषित कर सके, वह अपने निज के सामाजिक और पारिवारिक, व्यक्तिगत तथा नितान्त आत्मपरक, कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों से कभी भी बरी नहीं हो सकता। 

आजकल केवल अपनी परिस्थिति और अन्यायपूर्ण शोषण-व्यवस्था तथा शासन की शिथिलता, भ्रष्टाचार, आदि-आदि को गाली देकर, अपने कमज़ोर अहं के चारों ओर रक्षा-पाँति खड़ी कर ली जाती है। किन्तु यह स्पष्ट है कि इन रक्षा पाँतियों के अन्दर रहकर कमज़ोर अहं सुदृढ़ नहीं हो सकता। अहं से मेरा मतलब सिर्फ़ अपनी निजता की सत्ता से है। जिस प्रकार सिर्फ़ प्रस्ताव पास करके जनता का उद्धार नहीं हो सकता (ऐसी जनता जिसके हम स्वयं एक अंग हैं), उसी तरह सिर्फ़ गाली देने से, केवल बढ़-बढ़कर बोलने से, जनता-विरोधी शक्तियों की रक्षा-पाँतियाँ कभी नहीं टूटतीं। अतएव यह एकदम ज़रूरी है कि हम जनता के प्रति अपने सामूहिक और व्यक्तिगत उत्तरदायित्वों के निर्वाह की तरफ लगातार क़दम बढ़ायें।

लेकिन, अपने लक्ष्य की ओर सही तरीक़े से हम अपने क़दम तब तक नहीं बढ़ा सकते, जब तक कि हम अपने स्वयं के मन, वचन और कार्य की सही-सही आलोचना न कर सकें। अतएव, शोषण-व्यवस्था की निन्दा तथा प्रतिक्रियावादियों के विरुद्ध आलोचना करने के साथ-ही-साथ, हमारा यह आदि कर्तव्य हो जाता है कि हम आत्म-आलोचन के हथियार से ख़ुद पर नश्तर लगाकर, वे सब कमज़ोरियाँ दूर करें जो हमारे उत्तरदायित्व की पूर्ति के मार्ग में बाधक हो रही हैं या बाधक बन सकती हैं। इस मामूली सच्चाई को हम जितनी गहराई से समझेंगे, उतनी ही बड़ी ऊँचाई पर हम बढ़ सकेंगे। ग़लतियाँ सभी करते हैं, लेकिन बुद्धिमान वह है जो अपनी ग़लतियों को शीघ्र सुधार ले और अपने तजुर्बों से लगातार सीखता जाये। ध्यान रहे कि यह काम कहने में जितना आसान है, उतना ही करने में मुश्किल (इस लेख का लेखक इस बात को ख़ुद पहचानता है)।

इन बातों को दृष्टि में रखकर अगर हम अपने नौजवानों से कुछ निजी बातें करें तो अप्रासंगिक न होगा। यह सन्देह से परे है कि हमारा साधारण नौजवान आत्म-आलोचना के कठिन अस्त्र को ठीक तरह न प्रयोग करना जानता है, न इतनी चेतन दृष्टि ही रखता है कि वह हर समय जागरूक रह सके। कुछ ऐसे नवयुवक भी होते हैं, जो आत्मभर्त्सना के आवेश में आकर अपने ख़ुद के बारे में न मालूम क्या-क्या सोच लेते हैं!! आत्म-भर्त्सना कभी-कभी सही भी होती है, किन्तु अपने अन्दर प्रवृत्ति रूप में उसकी उपस्थिति, आत्मविश्वास को सुरंग लगा देती है और फलतः व्यक्तित्व को अन्दर से खोखला कर देती है। हम ऐसी आत्म-आलोचना के मार्ग की बात नहीं कर रहे हैं। आत्म-आलोचना का मार्ग इसलिए अपनाया जाता है कि भुजाओं में ताक़त पैदा हो, मस्तिष्क में अधिक तेज़ उत्पन हो, जिससे कि जनता के प्रति अपने अनिवार्य उत्तरदायित्वों की राह में आने वाले रोड़ों की मार की वेदना हमारे हृदय और मस्तिष्क पर हावी न हो। जिन नौजवानों के सामने, किसी न किसी सन्दर्भ से, किसी न किसी प्रकार, किन्हीं न किन्हीं अंशों में, जनता का यह लक्ष्य नहीं है, उनकी तो यहाँ बात ही नहीं हो रही है।

हमारे नौजवानों में कौन-कौन सी कमज़ोरियाँ हैं, इसको गिनाना और उनका विश्लेषण करना सरल नहीं है। ज़रूरी यह है कि इस विषय पर प्रकाश डालने के लिए कुछ ख़ास तरीक़े अपनाये जायें। यदि यह न करें तो कई बातें हैं जो छूट भी सकती हैं, जिन्हें हम छोड़ना न चाहेंगे। अतएव, पहले तो हम सरसरी तौर पर, उन बातों को कहते जायेंगे जो जहाँ-जहाँ जैसी-जैसी दिखायी देती हैं। इसके बाद हम कमज़ोरियों को विविध क्षेत्रों – जैसे पारिवारिक, व्यक्तिगत, सामाजिक आदि में विभाजित कर अपने तईं यह सोच लेंगे कि शेष कमज़ोरियों के विश्लेषण का काम हमारे नौजवान दोस्तों का है। (आत्म-आलोचना के बारे में ऊपर जो लिखा जा चुका है या अन्य सम्बन्धित विषयों पर लिखा जायेगा, वह निश्चय ही सीमा में बद्ध है। कमज़ोरियों के रूप परिस्थिति के अनुसार दिखायी देते हैं। चूँकि परिस्थितियाँ अनन्त हैं, इसलिए कमजोरियों के रूप भी अनन्त हैं। कमज़ोरियों की मर्दुमशुमारी का काम हमारा हर्गिज नहीं)।

हमारे नौजवान दोस्त, जो थोड़ा आगे बढ़े हुए हैं और एक विशेष क्षेत्र में मुख्तसर असर रखते हैं, उनके सम्बन्ध में पहले चर्चा कर लेंगे। साधारण रूप से हमें कमज़ोरियों के क्षेत्र में तीन प्रकार के लोग यहाँ दिखायी देंगे। एक वे जो अपनी बातचीत के द्वारा, भाषण कला के द्वारा, लिखाई के ज़रिये, किसी न किसी प्रकार से असर क़ायम करते हैं; किसी न किसी रूप से, कहीं न कहीं, किसी विशेष स्तर पर, या साधारण रूप से, अहंकारी होते हैं। निश्चय ही, इस अहंकार का जनता के लक्ष्यों से असामंजस्य है। अहंकार से कुछ लोगों में रंग भले ही पैदा हो, उसके द्वारा दिलोदिमाग़ के दरवाजे बन्द हो जाते हैं। अहंकार से सूक्ष्य और स्थूल प्रकार की बेईमानी, बददयानती, अवसरवादिता, दादागिरी, रंगदारी, वाचालता, ढीली जबान, निन्दा प्रचार, असावधानता और जिज्ञासा का सर्वनाश, आदि दोष उत्पन्न होते हैं। एक जुर्म से दूसरा जुर्म पैदा होता है। व्यक्तित्व में हृास शुरू होता है। जिस प्रकार विकास की मंज़िलें होती हैं, उसी प्रकार हृास की प्रक्रिया की भी अधोगामी सीढ़ियों का विस्तार होता है। अहंकारी व्यक्ति की बुद्धि की ख़ूबी यह है कि सच में कितनी झूठ मिलायी जाय कि जिससे वह प्रभावकारी हो सके और रंग जमा सके। वह जानता है। इन्हीं बुद्धिमान अहंकारियों में से हजारों नौजवान लीडरी के क्षेत्र में आते हैं – वह लीडरी फिर चाहे जिस क्षेत्र की हो। देखा सिर्फ़ इतना जाता है कि ख़ुद टोटे में न रहें। इस बचाव को ख़्याल में रखते हुए, फिर सभी गुण–जैसे, हार्दिकता, मार्मिकता, सूक्ष्मता, सत्योद्घाटन, सत्यवचन, ऊपरी तौर की मेहनत, आदि बातें सामने की जाती हैं कि जिससे लोग उनकी अच्छाइयों (जिसको वे मानवता कहेंगे) को देख सकें। प्रभाव जम चुकने के उपरान्त और अगर मुँहफट हुए तो प्रारम्भ से ही, दूसरों की निन्दा पान में लौंग जैसी काम करती है।

दूसरे प्रकार के नौजवान वे होते हैं, जिन्हें व्यक्तिगत आकर्षण और प्रभाव सबसे ज़्यादा अच्छे लगते हैं, भले ही उस आकर्षण और उस प्रभाव का सिद्धान्त से अथवा समस्याओं से कोई सम्बन्ध हो या न हो। ऐसे नौजवान अपने व्यक्तित्व का न सफलतापूर्वक विकास कर सकते हैं, न ही उन समस्याओं का ठीक तरह विचार कर सकते हैं जो उनके और उन्हीं सरीखे दूसरों के मन को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उद्वेलित करती रहती हैं। स्वयं ईमानदार होते हुए भी, आकर्षण और प्रभाव के वशीभूत होकर, वे अन्ततः अपनी मौलिक शक्तियों का न (तो स्वयं) उपयोग कर पाते हैं, न उनका सामाजिक उपयोग हो पाता है। एक प्रकार का अनुगामित्व अथवा अपने ही में बन्द रहने की प्रवृत्ति तथा जिज्ञासा का अभाव, आदि विशेष कमजोरियाँ इस वर्ग में निहित रहती हैं।

तीसरी श्रेणी के नौजवानों की प्रकृति ही अलग है। सजी हुई बैठक-कमरे की गन्ध, उनके मन में काम करती हुई, उन्हें ऐसे कार्यों की तरफ ही ले जाती है, जिससे जातीय सामाजिक भद्रता, आदि प्रतिष्ठित (रेस्पैक्टेबिल) वर्ग की कामनाओं की पूर्ति हो सके। उनके लिए अच्छी-ख़ासी बड़ी सी नौकरी, सुघड़-सुन्दर बीवी, कोच, किताबों की एक ख़ूबसूरत आलमारी, एक ट्रे चाय, सुघर चम्मच, दीवार पर सुरुचिपूर्ण तस्वीरें, आदि सर्वाधिक प्रधान हैं। उनका अहंकार सिर्फ़ एक ही बात में तृप्त हो जाता है कि अगर कोई प्रतिष्ठित साहित्यिक, महत्त्वपूर्ण नेता, बैठकबाज उम्दा धनी व्यक्ति, यानी ऐसे भद्रजन (उनके घर आयें), जिनके आने से उनकी स्वयं की भद्रता और नगर में अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को चार चाँद लग सकें। ऐसे नौजवान हमारे ख़्याल से जनता के दुश्मन न होते हुए भी दुश्मन जैसे ही हैं। उनमें वे सभी दुर्गुण रहते हैं, जो उनके वर्ग में पाये जाते हैं–जैसे, फर्स्ट क्लास एम.ए. करना हो तो परीक्षकों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दबाव डालने के लिए समाज के ऊँचे वर्ग के प्रतिष्ठित लोगों से दोस्ती। खानदान का गर्व, परिवार की प्रतिष्ठा, इनके लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होती है।

नौजवान मौलिक होता है। उसके हृदय में स्वाभाविक रूप से प्रकृति की मौलिक शक्तियाँ काम करती रहती हैं। किन्तु जब हम उसे अपनी शक्तियों को फालतू की बकवास, व्यर्थ का फक्कड़पन, निस्सार बातें, ग़ैरजिम्मेवाराना बर्ताव, आदि करते देखते हैं, तो लगता है कि क्या इसे नौजवान कहा जा सकता है!! 
नौजवानी का कौन-सा चित्र हमारे सामने रहना चाहिए?
तर्कसंगत शुद्ध विचार-सरणि और जिज्ञासा, तथ्यों को पहचानने, उनको संगठित कर उनके निष्कर्ष निकालने की शक्ति;
उज्ज्वल आदर्शवाद; बेईमानी, दुमुँही बातें, उत्तरदायित्वहीनता, कामचोरी, मौखिक आदर्शवाद, घमण्ड, अहंकार आदि का अभाव;
ज्ञान के सामने, सत्य के सामने, हार्दिकता और मार्मिकता के सामने, प्रेम और त्याग के सामने, निरन्तर नम्रता और विनय;
मानव के सतत संघर्षमय विकास में आस्था; बुराइयों, बाधाओं, व्यवधानों, जनता के शत्रुओं पर मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृतिजन्य शुद्ध हृदय में विश्वास;
जनता के उद्धार में श्रद्धा, उनके संघर्षों की सफलता में आध्यात्मिक विश्वास, जनता की सृजनशील ऐतिहासिक शक्तियों की विजय का स्वप्न;
अपने अनुभवों से, दूसरों के तज़ुर्बों से, हमेशा सीखते रहने का जागरूक प्रयास और बेखटके और बेशरमाये अपनी ग़लतियों को सबके सामने स्वीकार करने की नम्र महानता; दूसरों की ग़लतियों और दुर्गुणों के–बशर्ते कि वे बहुत हानिकारक न हों–सहानुभूतिपूर्ण, ईमानदार विश्लेषण का उदारतापूर्ण उत्तरदायित्व, साहसपूर्ण और निश्चयात्मक क़दम बढ़ाने की योग्यता; तथा व्यक्तिगत जीवन का संगठन आदि-आदि बातें ऐसी हैं जिन्हें और भी बढ़ाया जा सकता है: (आगे का हिस्सा अनुपलब्ध)


19 February 2015

महात्मा, मौलाना और चाय की प्याली

Displaying Shubhneet pic.jpg
शुभनीत कौशिक

[शुभनीत स्वाधीन के सबसे समर्पित स्तम्भ हैं। उन्होंने मौलाना आज़ाद की क़िताब गुबार-ए-ख़ातिर के बहाने से चाय के इतिहास पर एक लेख पिरो डाला है। जिसके तीन मुख्य आयाम हैं - चाय के मुनाफ़ेदार व्यापार को बढ़ाने की औपनिवेशिक कोशिशें, गाँधी की चाय को लेकर आपत्तियाँ और मौलाना आज़ाद की चाय के चुस्कियों के लिए दीवानगी। यह लेख जरूर पढ़ें....]

चाय आज हर भारतीय के रोज़मर्रा की जिंदगी का अनिवार्य और सार्वभौम पहलू है। समाज, संस्कृति, सिनेमा, साहित्य और खासकर राजनीति में भी (कभी ‘चाय पार्टियों’ तो कभी ‘चाय पर चर्चा’ के जरिए) चाय विमर्श बनाने, रणनीतियां तैयार करने और चर्चा-परिचर्चा के दौर को गरमागरम बनाए रखने में प्रमुख भूमिका अदा करती है। यह अविश्वसनीय-सा लगता है कि भारतीय समाज का सदा-सर्वदा से अभिन्न अंग प्रतीत होने वाली हम सबकी प्रिय चाय से भारतीय जनमानस का पहले-पहल परिचय औपनिवेशिक काल के आख़िरी दशकों में हुआ। इतिहासकार गौतम भद्र चाय के एक साम्राज्यवादी उत्पाद से हिंदुस्तान के ‘राष्ट्रीय पेय’ में तब्दील होने का बड़ा रोचक ब्योरा (ख़ासकर बंगाल के संदर्भ में) देते हैं।  

Image result for tea advertisement in india
चाय का एक उपनिवेशकालीन विज्ञापन 
यहाँ मेरी दिलचस्पी चाय के इस ऐतिहासिक वृत्तांत के महाआख्यान की एक उपकथा को सुनाने में है। तो ब्रिटिश राज़ के आखिरी दशकों में चाय पीना गाहे-बगाहे सामाजिक गतिशीलता का परिचायक बन चुका था। मार्च 1935 से, हिन्दी दैनिक आज के पन्नों पर भी चाय के विज्ञापन नुमाया होने लगे। ये विज्ञापन इंडियन टी मार्केट एक्सपेन्शन बोर्ड द्वारा भारत में चाय को लोकप्रिय बनाने के लिए शुरू की गयी मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा थे। ख़ुद इंडियन टी मार्केट एक्सपेन्शन बोर्ड भी इसी वर्ष अस्तित्त्व में आया। इन विज्ञापनों में चाय को हिंदुस्तान का ‘सर्वोत्तम, सस्ता और शुद्धतम पेय पदार्थ’ बताया जाता था।  इन आरंभिक विज्ञापनों में में आमतौर पर एक प्याली चाय की तस्वीर होती थी, जिसके साथ इनमें से कोई एक संदेश छपा होता था: ‘हिंदुस्तान की सबसे सस्ती पीने की चीज’, ‘हिंदुस्तान की विशुद्ध पेय’, ‘हिंदुस्तान की सबसे अच्छी पीने की चीज’, ‘हिंदुस्तान की मन प्रसन्न रखने वाली चीज’। 

इन विज्ञापनों में, बहुधा, उलाहना भरे स्वर में पाठकों से कहा जाता था कि वे उतनी बार चाय नहीं पीते, जितनी की उन्हें पीनी चाहिए, और यह भी कि चाय के प्रति ‘उदासीनता’ से भारतीयों को जल्द ही निजात पा लेनी चाहिए। चाय के प्रति भारतीयों की ‘उदासीनता’ को दूर करने के लिए यह भी जोड़ा जाता कि ‘हम लोग यह महसूस नहीं करते की संसार कि अधिकांश सुगंधित चाय हमारे देश भारत में हमारे देशवासियों के श्रम से उत्पन्न होती है’।  एक दूसरे विज्ञापन में, राष्ट्रवादी नेता लोकमान्य तिलक के प्रसिद्ध नारे ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ को, कुछ इस तरह पेश किया गया: ‘इस(चाय)को पीना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है’।   

Image result for tea advertisement in india
लिप्टन चाय, जो भारत की सबसे पुरानी चाय कंपनियों में एक थी, का विज्ञापन 
अक्सर विज्ञापनों में चाय पीने से होने वाले ‘फ़ायदों’ को गिनाया जाता था, खासतौर पर ‘अच्छे स्वास्थ्य और सक्रिय जीवन में चाय के योगदान’ को लेकर, और यहाँ तक कहा जाता कि ‘भारतीय चाय पीकर अपने जीवन काल को बढ़ाइए’और यह भी कि ‘दूसरे देशों में भारतीय चाय का सम्मान होता है’ क्योंकि इसकी वजह से उन देशों में जीवन-काल बढ़ गया। ‘सस्ते और ऊर्जादायी होने’ जैसे गुणों की वजह से चाय को भारतीय श्रमिकों को ताजगी देने वाले पेय के रूप में भी दिखाया गया, जो दिन भर के काम के बाद थके-हारे श्रमिकों को थकान से मुक्त कर देने वाला पेय है। पर ख़ुद चाय के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों के स्थिति बदतर थी। जवाहरलाल नेहरू अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया में चाय बागान के श्रमिकों की दुर्दशा बताने के लिए ब्रिटिश ट्रेड यूनियन काँग्रेस के एक शिष्टमंडल की रिपोर्ट का हवाला देते हैं, जो 1928 में हिंदुस्तान आया था, जिसमें कहा गया था कि ‘असम के चाय में साल-दर-साल लाखों हिंदुस्तानियों का पसीना, भूख और निराशा शामिल होती है’।  

चाय के पक्ष में और चाय को लोकप्रिय बनाने के लिए इंडियन टी मार्केट एक्सपेन्शन बोर्ड द्वारा चलाये जा रहे इस अभियान के प्रति भारतीय राष्ट्रवादी नेतृत्त्व की चिंता को गांधी ने सबसे स्पष्ट रूप में रखा। गांधी ने इस विज्ञापन मुहिम को ‘झूठे विज्ञापन’ का नमूना बताया। बंगाल और अन्य प्रान्तों में चाय पीने को लोकप्रिय बनाने के लिए चलाये जा रहे ‘प्रोपेगंडा’ पर, जिसमें ‘चाय पीओ और हमेशा जवान दिखो’ जैसे दावे किए जा रहे थे और लोगों से दिन भर में ज्यादा से ज्यादा चाय पीने को कहा जा रहा था, टिप्पणी करते हुए गांधी ने हरिजन में 24 अगस्त, 1935 को लिखा: 
चाय पीनेके पक्ष में यह विज्ञापन ऐसा एक ऐसा दावा हमारे सामने रखता है, जिसे मनुष्यके अनुभवका कहीं भी समर्थन नहीं मिलता। देखने में तो इससे उलटा ही आता है। चायके पक्षमें वकालत करनेवाले भी बहुत ही थोड़ी चाय पीनेकी सलाह देते हैं। हिंदुस्तानके लोग अगर चाय न पीएं, तो इससे उनकी कोई हानि तो होगी ही नहीं।... ऐसी-ऐसी झूठी बातें...बड़ी ही खतरनाक होती हैं। नित्य तीस-तीस प्याले चाय पी डालना – यह क्या है? इससे शरीर और दिमागमें भला ताजगी आएगी ? इससे तो पाचन-शक्ति कमजोर पड़ जाएगी और शरीर क्षीण हो जायेगा।  

Image result for gandhi and tea

गाँधी चाय नहीं पीते थे। इस फोटो में भी वे चाय न पीकर अपना नियत नाश्ता ले रहे हैं। 
उसी लेख में गांधी ने चीनी लोगों की चाय बनने की पद्धति पर टिप्पणी करते हुए लिखा कि ‘चीनी लोग—पत्तियोंको छन्नीमें रखकर उनपर खौलता हुआ पानी डालते हैं। पत्तियोंको वे चायदानीमें कभी नहीं डालते। पानीमें पत्तियों का सिर्फ रंग उतार आता है’। चीन और हिंदुस्तान में तैयार चाय की तुलना करते हुए गांधी ने लिखा कि चीनियों की चाय ‘हल्के पीले रंग की होती है हिंदुस्तान की तरह लाल रंग की नहीं’। चाय के दुष्प्रभावों के बारे में हरिजन के पाठकों को सचेत करते हुए गांधी ने आगे जोड़ा:

हलकी-सी चायके दो प्याले पी लेनेमें शायद नुकसान नहीं होता, और मनुष्य का शरीर इतनी ही चाय पचा सकता है। फिर हिंदुस्तानमें चायकी पत्तियाँ असलमें उबाली जाती हैं और इस तरह उनका सारा ‘टैनिन’ पानी में खिंच आता है। कोई भी डॉक्टर यह प्रमाणित कर देगा कि मेदे के लिए यह ‘टैनिन’ अच्छी चीज नहीं है।  

पर गांधी के उलट, राष्ट्रीय आंदोलन के एक अन्य महत्त्वपूर्ण नेता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद चाय के रसिक थे। उनकी रसिकता का अंदाज़ा हमें होता है उनके ख़तों से, जो उन्होंने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ़्तारी के बाद जेल से लिखे थे। ये खत आज़ाद ने अपने दोस्त नवाब सद्र यार ज़ंग को अहमदनगर जेल से लिखे थे। बाद में, 1946 में किताब के शक्ल में ये ख़त गुबार-ए-ख़ातिर में प्रकाशित हुए। लगभग एक साल के दरमियान, अगस्त 1942 से सितंबर 1943, लिखे गए ये ख़त एक राष्ट्रवादी नेता की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से हमें वाबस्ता कराते हैं। 

ये ख़त अकसरहा सुबह-सुबह चाय की चुसकियाँ लेते हुए लिखे गए, इसलिए इनमें गाहे-बगाहे चाय की भी चर्चा होती ही थी। अपनी पसंदीदा चाय के बारे में बताते हुए आज़ाद 17 दिसंबर 1942 को एक ख़त में लिखते हैं कि ‘एक मुद्दत से जिस चीनी चाय का आदी हूँ वो व्हाइट जेस्मिन कहलाती है यानी 'यास्मने -सफ़ेद' या ठेठ उर्दू में यूँ कहिए कि 'गोरी चंबेली'... इसकी खुशबू जिस कदर लतीफ़ है, उतना ही क़ैफ़ (नशा) तुंद-व-तेज़ है’।  वे एक जगह यह भी जोड़ते हैं कि वे ‘अफ़सुर्दगियों का चाय के गरम जामों से इलाज’ किया करते हैं और स्याही ख़त्म होने पर कलम को चाय के फ़िंजान में भी डुबो देते हैं और कहते हैं कि ‘आज कलम को भी एक घूँट पिला दिया’।

आज़ाद एक ख़त में लिखते हैं कि वे चाय के लिए रूसी फ़िंजान काम में लाते हैं। रूसी फ़िंजान की खूबियाँ गिनाते हुए, 27 अगस्त 1942 को लिखे गए इस ख़त में, वे आगे जोड़ते हैं कि ‘ये (रूसी फ़िंजान) चाय की मामूली प्यालियों से बहुत छोटे होते हैं। अगर बेज़ौकी के साथ पीजिए तो दो घूँट में खत्म हो जायें। मगर ख़ुदा न ख़ास्ता मैं ऐसी बेज़ौकी का मुर्तकिब क्यों होने लगा ? मैं जुरआ-कशाने-कुहन-मश्क (पुराने पीने वाले की तरह) ठहर-ठहरकर पीऊँगा और छोटे-छोटे घूँट लूँगा’।  अपने चाय के प्रयोगों के बारे में विस्तार से लिखते हुए, 3 अगस्त 1942 को लिखे गए, एक ख़त में आज़ाद लिखते हैं:

मैंने चाय की लताफ़त व शीरीनी को तंबाकू की तुंदी व तलख़ी  से तरकीब देकर एक कैफ़े-मुरक्कब (मिश्रित नशा) पैदा करने की कोशिश की है। मैं चाय के पहले घूंट के साथ ही मुत्तसिलन एक सिगरेट भी सुलगा लिया करता हूँ फिर इस तरकीबे-खास का नक़्शे-अमल यूँ जमाता हूँ कि थोड़े-थोड़े वक़्फे के बाद चाय का एक घूँट लूँगा और मुत्तसिलन सिगरेट का भी एक कश लेता रहूँगा...इस तरह इस सिलसिलये-अमल की हर कड़ी चाय के एक घूँट और सिगरेट के एक कश के बाहमी इम्तिजाज (आपसी मेल) से बितदरीज ढलती जाती है और सिलसिलये-कार दराज़ होता रहता है। मिक़दार के हुस्ने-तनासुब का इंज़्बात (सुमेल का ढंग) मुलाहिजा हो कि इधर फ़िंजान आखिरी जुरए (घूँट) से खाली हुआ, उधर तंबाकूये आतिशज़दा ने सिगरेट के आख़िरी खत्ते-कशीद (हद) तक पहुँचकर दम लिया।  

मौलाना आज़ाद लिखते हैं कि वे चाय को ‘सिर्फ़ चाय के लिए’ पीते हैं, जबकि ‘दूसरे दूध और शक्कर के लिए’ पीते हैं। वे तफ़सील से बताते हैं कि कैसे चाय चीन से रूस, तुर्किस्तान और ईरान में पहुंची और फिर इंग्लैण्ड तक। वे हिंदुस्तान में चाय में दूध मिलाने को हरगिज़ पसंद नहीं करते थे। और इस बुराई के लिए भी कसूरवार वे अंग्रेज़ों को ही ठहराते थे। बक़ौल मौलाना आज़ाद:

सत्रहवीं सदी में जब अंग्रेज़ इससे (चाय से) आशना हुए तो नहीं मालूम उन लोगों को क्या सूझी, उन्होंने दूध मिलाने की बिदाअत (नई बात) ईजाद की। और चूंकि हिंदुस्तान में चाय का रिवाज़ उन्हीं के जरिये हुआ इसलिए यह बिदअते-सैयअ यहाँ भी फैल गयी। रफ़्ता-रफ़्ता मुआमला यहाँ तक पहुंच गया कि लोग चाय में दूध डालने की जगह दूध में चाय डालने लगे...लोग चाय का एक तरह का सय्याल (तरल) हलवा बनाते हैं, खाने की जगह पीते हैं और खुश होते हैं की हमने चाय पी ली। इन नादानों से कौन कहे कि: हाय कमबख़्त तूने पी ही नहीं! 

अनुवाद करें