18 July 2015

मुसलमान

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[आज ईद के मौके पर देवी प्रसाद मिश्र की "मुसलमान" कविता "स्वाधीन" के पाठकों के लिए पेश है, इस कविता को पढ़कर जानिए कि मुसलमानों का इस देश के निर्माण में क्या खून- पसीना लगा है... और कैसे ये फुफकारते यवन सांप' इस देश का हिस्सा बन गए...]

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देवी प्रसाद मिश्र 

मुसलमान 
कहते हैं वे विपत्ति की तरह आए
कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले
वे व्याधि थे

ब्राह्मण कहते थे वे मलेच्छ थे

वे मुसलमान थे

उन्होंने अपने घोड़े सिन्धु में उतारे
और पुकारते रहे हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!

बड़ी जाति को उन्होंने बड़ा नाम दिया
नदी का नाम दिया

वे हर गहरी और अविरल नदी को
पार करना चाहते थे

वे मुसलमान थे लेकिन वे भी
यदि कबीर की समझदारी का सहारा लिया जाए तो
हिन्दुओं की तरह पैदा होते थे

उनके पास बड़ी-बड़ी कहानियाँ थीं
चलने की
ठहरने की
पिटने की 
और मृत्यु की

प्रतिपक्षी के ख़ून में घुटनों तक
और अपने ख़ून में कन्धों तक
वे डूबे होते थे
उनकी मुट्ठियों में घोड़ों की लगामें
और म्यानों में सभ्यता के 
नक्शे होते थे

न! मृत्यु के लिए नहीं
वे मृत्यु के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे

वे मुसलमान थे

वे फ़ारस से आए
तूरान से आए
समरकन्द, फ़रग़ना, सीस्तान से आए
तुर्किस्तान से आए

वे बहुत दूर से आए
फिर भी वे पृथ्वी के ही कुछ हिस्सों से आए
वे आए क्योंकि वे आ सकते थे

वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे कि या ख़ुदा उनकी शक्लें
आदमियों से मिलती थीं हूबहू
हूबहू

वे महत्त्वपूर्ण अप्रवासी थे
क्योंकि उनके पास दुख की स्मृतियाँ थीं

वे घोड़ों के साथ सोते थे
और चट्टानों पर वीर्य बिख़ेर देते थे
निर्माण के लिए वे बेचैन थे

वे मुसलमान थे


यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है
तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए

कि वे प्रायः इस तरह होते थे
कि प्रायः पता ही नहीं लगता था
कि वे मुसलमान थे या नहीं थे

वे मुसलमान थे

वे न होते तो लखनऊ न होता
आधा इलाहाबाद न होता
मेहराबें न होतीं, गुम्बद न होता
आदाब न होता

मीर मक़दूम मोमिन न होते
शबाना न होती

वे न होते तो उपमहाद्वीप के संगीत को सुननेवाला ख़ुसरो न होता
वे न होते तो पूरे देश के गुस्से से बेचैन होनेवाला कबीर न होता
वे न होते तो भारतीय उपमहाद्वीप के दुख को कहनेवाला ग़ालिब न होता

मुसलमान न होते तो अट्ठारह सौ सत्तावन न होता

वे थे तो चचा हसन थे
वे थे तो पतंगों से रंगीन होते आसमान थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे और हिन्दुस्तान में थे
और उनके रिश्तेदार पाकिस्तान में थे

वे सोचते थे कि काश वे एक बार पाकिस्तान जा सकते
वे सोचते थे और सोचकर डरते थे

इमरान ख़ान को देखकर वे ख़ुश होते थे
वे ख़ुश होते थे और ख़ुश होकर डरते थे

वे जितना पी०ए०सी० के सिपाही से डरते थे
उतना ही राम से
वे मुरादाबाद से डरते थे
वे मेरठ से डरते थे
वे भागलपुर से डरते थे
वे अकड़ते थे लेकिन डरते थे

वे पवित्र रंगों से डरते थे
वे अपने मुसलमान होने से डरते थे

वे फ़िलीस्तीनी नहीं थे लेकिन अपने घर को लेकर घर में
देश को लेकर देश में
ख़ुद को लेकर आश्वस्त नहीं थे

वे उखड़ा-उखड़ा राग-द्वेष थे
वे मुसलमान थे

वे कपड़े बुनते थे
वे कपड़े सिलते थे
वे ताले बनाते थे
वे बक्से बनाते थे
उनके श्रम की आवाज़ें 
पूरे शहर में गूँजती रहती थीं

वे शहर के बाहर रहते थे

वे मुसलमान थे लेकिन दमिश्क उनका शहर नहीं था
वे मुसलमान थे अरब का पैट्रोल उनका नहीं था
वे दज़ला का नहीं यमुना का पानी पीते थे

वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए बचके निकलते थे
वे मुसलमान थे इसलिए कुछ कहते थे तो हिचकते थे
देश के ज़्यादातर अख़बार यह कहते थे
कि मुसलमान के कारण ही कर्फ़्यू लगते हैं
कर्फ़्यू लगते थे और एक के बाद दूसरे हादसे की
ख़बरें आती थीं

उनकी औरतें
बिना दहाड़ मारे पछाड़ें खाती थीं
बच्चे दीवारों से चिपके रहते थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए
जंग लगे तालों की तरह वे खुलते नहीं थे

वे अगर पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे
तो उससे कई गुना ज़्यादा बार 
सिर पटकते थे
वे मुसलमान थे

वे पूछना चाहते थे कि इस लालकिले का हम क्या करें
वे पूछना चाहते थे कि इस हुमायूं के मक़बरे का हम क्या करें
हम क्या करें इस मस्जिद का जिसका नाम
कुव्वत-उल-इस्लाम है
इस्लाम की ताक़त है

अदरक की तरह वे बहुत कड़वे थे
वे मुसलमान थे

वे सोचते थे कि कहीं और चले जाएँ
लेकिन नहीं जा सकते थे
वे सोचते थे यहीं रह जाएँ
तो नहीं रह सकते थे
वे आधा जिबह बकरे की तरह तकलीफ़ के झटके महसूस करते थे

वे मुसलमान थे इसलिए
तूफ़ान में फँसे जहाज़ के मुसाफ़िरों की तरह
एक दूसरे को भींचे रहते थे

कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि
उन्हें फेंका जाए तो 
किस समुद्र में फेंका जाए
बहस यह थी
कि उन्हें धकेला जाए
तो किस पहाड़ से धकेला जाए

वे मुसलमान थे लेकिन वे चींटियाँ नहीं थे
वे मुसलमान थे वे चूजे नहीं थे

सावधान!
सिन्धु के दक्षिण में
सैंकड़ों सालों की नागरिकता के बाद
मिट्टी के ढेले नहीं थे वे

वे चट्टान और ऊन की तरह सच थे
वे सिन्धु और हिन्दुकुश की तरह सच थे
सच को जिस तरह भी समझा जा सकता हो
उस तरह वे सच थे
वे सभ्यता का अनिवार्य नियम थे
वे मुसलमान थे अफ़वाह नहीं थे

वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे.

14 July 2015

National Anthem ‘Adhinayaka’ debate: It’s not about King George (With Hindi Translation)

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Ram Puniyani
11 July, 2015, The Indian Express

The debate about our national anthem is a ceaseless one — the ones related to undermining Jana Gana Mana and pushing forward Vande Matram, so to say. To undermine the Jana Gana Mana time and again, questions have been raised about its having been written in praise of George V, the king of England. This issue was brought up once again by Kalyan Singh on July 7, while speaking at a function organised by Rajasthan University. Singh, who was the Uttar Pradesh chief minister when the Babri Masjid was demolished despite his undertaking to the National Integration Council that the mosque will be protected, has a BJP background. He said that the word “adhinayak” in the national anthem refers to the foreign power, so it should be replaced by Jana Gana Mangal Gaye. This is a totally distorted understanding of the events as they took place. Singh, while asking for this amendment, also says that though he respects Rabindranath Tagore, this change is needed in the anthem. Surely what he is demanding is unwarranted. The perception that Jana Gana Mana was written in praise of George V is based on media reports of the time, which were not very accurate. The media in the early 20th century was pro-British and was not too familiar with local languages. Hence the follies and sloppiness in reporting.


Jana Gana Mana emerged as the most acceptable song to be the national anthem as it reflected the pluralism of the country. This perception that “adhinayak” is a reference to George V has been perpetuated by the English media. In 1911, when George V visited India, theCongress wanted to thank him for retracting the British decision to partition Bengal. This was the first success of swadeshi movement, the first major step in the modern anti-colonial movement. The movement, which had begun in 1905, wanted the government to revoke its decision to partition Bangal. During the session of the Congress that commenced on December 26, 1911, two songs were sung on the same day — one written by Tagore, Jana Gana Mana, and the other that of one Ramanuj Choudhary,
who had composed a song especially for George V.

The English media was neither accurate nor serious about properly reporting such events. So what was reported by the British media was that Tagore song was sung in praise of George V. As such, the intent and meaning of what Tagore is referring to was correctly described by a commentator in the vernacular press: His song was in “praise of the dispenser of human destiny, who appears in every age”, and not George V, as projected by the Anglo-India media.

When Tagore was asked by a friend loyal to British to write a song in praise of George V, Tagore was angered, as he was opposed to the British rule. Instead of one for George, he wrote a song devoted to the dispenser of human destiny. When faced with the British media’s projection and such criticism, Tagore wrote “That great charioteer of man’s destiny in age after age could not by any means be George V or George VI or any George. Even my ‘loyal’ friend realised this, because, however powerful his loyalty to the king, he was not wanting in intelligence.” The song gained popularity all over and its English translation, “Morning song of India”, also picked up in different parts. Netaji’s Azad Hind Fauj adopted it as the national anthem and Gandhiji went on to say, “the song has found a place in our national life”. Communal elements favour “Vande Matram” and are uncomfortable with Jana Gana Mana because of its message of pluralism, and so keep searching for pretexts to undermine it.

(The writer is chairman, Centre for Study of Society and Secularism, Mumbai)


गुरुदेव द्वारा स्वयं इस आरोप का खंडन  

‘‘ जन गण मन अधिनायक ’’ नहीं है किंग जार्ज के बारे में

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा; हस्तक्षेप न्यूज़ पोर्टल से साभार)

हमारे राष्ट्रगान पर चल रही बहस का कोई अंत दिखलाई नहीं दे रहा है। एक लंबे समय से ये कोशिशें चल रही हैं कि जन गण मन के मुकाबले वंदे मातरम को देश का बेहतर राष्ट्रगान साबित किया जाए। जन गण मन के प्रति लोगों के मन में सम्मान भाव को कम करने के लिए बार-बार यह कहा जाता रहा है कि यह गीत इंग्लैंड के बादशाह जार्ज पंचम की शान में लिखा गया था। गत 7 जुलाई को राजस्थान विश्वविद्यालय में भाषण देते हुए भाजपा नेता कल्याण सिंह ने इस मुद्दे को फिर से उछाला। जिस समय बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी, कल्याण सिंह उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने राष्ट्रीय एकता परिषद को यह वचन दिया था कि मस्जिद की रक्षा की जाएगी परंतु उन्होंने अपने वचन का पालन नहीं किया। कल्याण सिंह ने कहा कि हमारे राष्ट्रगान में अधिनायक शब्द जार्ज पंचम के लिए इस्तेमाल किया गया है और इसलिए राष्ट्रगान की पहली पंक्ति को ‘‘जन गण मंगल गाये’’ कर दिया जाना चाहिए।

कल्याण सिंह ने इस सुधार की मांग करते हुए यह दोहराया कि वे गुरूदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर का बहुत सम्मान करते हैं। भाजपा नेता का यह दावा और उनकी मांग, दोनों ही तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। जो मांग वे कर रहे हैं, वह अनुचित और अकारण है। यह धारणा कि जन गण मन जार्ज पंचम की शान में लिखा गया था, तत्समय अखबारों में छपी खबरों पर आधारित है, जो कि सही नहीं थीं। 20वीं सदी की शुरूआत में, देश के अधिकांश समाचारपत्र ब्रिटिश-समर्थक थे और उनमें काम करने वाले पत्रकारों का भारतीय भाषाओं का ज्ञान सीमित था। इसी कारण इस तरह की गलत धारणा बनी।

जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में इसलिए अपनाया गया क्योंकि वह देश के बहुवादी चरित्र को प्रतिबिंबित करता है। ‘‘अधिनायक’’ शब्द जार्ज पंचम के लिए प्रयुक्त किया गया है, यह गलत धारणा तत्कालीन अंग्रेजी समाचारपत्रों ने फैलाई थी। सन् 1911 में जब जार्ज पंचम भारत आए तब बंगाल के विभाजन के निर्णय को ब्रिटिश सरकार द्वारा वापिस लिए जाने के लिए कांग्रेस, उन्हें धन्यवाद देना चाहती थी। बंगाल के विभाजन के निर्णय को रद्द करने के लिए ब्रिटिश सरकार को मजबूर होना पड़ा था। यह स्वदेशी आंदोलन की पहली बड़ी सफलता थी और भारत के साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष का पहला कदम। सन् 1905 में प्रारंभ हुए स्वदेशी आंदोलन की मांग थी कि बंगाल के विभाजन का निर्णय वापिस लिया जाए। 26 दिसंबर 1911 को कांग्रेस के अधिवेशन के पहले दिन दो गीत गाए गए। एक रबीन्द्रनाथ टैगोर रचित जन गण मन और दूसरा जार्ज पंचम की यात्रा के अवसर पर रामानुज चौधरी नामक एक अज्ञात सज्जन द्वारा रचित गीत।

उस समय के अंग्रेजी समाचारपत्र इस तरह की घटनाओं की रिपोर्टिंग करने में न तो बहुत गंभीर रहते थे और न तथ्यों की बहुत परवाह करते थे। यही कारण है कि अंग्रेजी अखबारों में यह छपा कि टैगोर का गाना जार्ज पंचम की शान में था। टैगोर, असल में, किसकी ओर संकेत कर रहे थे, यह भाषाई प्रेस के एक टिप्पणीकार ने स्पष्ट किया: ‘‘उनका गीत मनुष्यों के भाग्यविधाता की स्तुति में था न कि जार्ज पंचम की स्तुति में, जैसा कि एंग्लो-इंडियन मीडिया ने प्रस्तुत किया है‘‘। जब अंग्रेजों के प्रति वफादार उनके एक मित्र ने रबीन्द्रनाथ टैगोर से जार्ज पंचम की स्तुति में एक गीत रचने को कहा तो वे बहुत नाराज हुए क्योंकि वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ थे। उन्होंने जार्ज पंचम की बजाए मनुष्यों के भाग्यविधाता को समर्पित गीत लिखा। जब ब्रिटिश मीडिया में इस आशय की खबरें छपीं कि उन्होंने जार्ज पंचम की स्तुति में गीत लिखा है और उनकी कई व्यक्तियों ने निंदा की तब टैगोर ने लिखा, ‘‘मानव के भाग्य का वह महान विधाता, जो हर युग में मौजूद रहा है, किसी भी स्थिति में जार्ज पंचम या जार्ज द्वितीय या कोई भी जार्ज नहीं हो सकता। मेरे उस ‘वफादार मित्र’ को भी यह बात समझ में आ गई क्योंकि सम्राट के प्रति उसकी वफादारी चाहे जितनी रही हो, उसमें बुद्धि की कमी नहीं थी।’’ यह गीत जल्दी ही बहुत लोकप्रिय हो गया और उसके अंग्रेजी अनुवाद ‘‘मॉर्निंग सांग ऑफ इंडिया’’ को भी बहुत प्रसिद्धि मिली। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज ने इसे राष्ट्रगान के रूप में अपनाया और गांधीजी ने कहा, ‘‘इस गीत ने हमारे राष्ट्रीय जीवन में स्थान बना लिया है।’’ सांप्रदायिक तत्व, वंदे मातरम को तरजीह देते हैं क्योंकि उन्हें जन गण मन पसंद नहीं है। और इसका कारण यह है कि जन गण मन में बहुवाद का संदेश निहित है। वे इस गीत को बदनाम करने के बहाने और मौके ढूंढते रहते हैं।

आरएसएस और हिंदुत्व परिवार, जन गण मन के मुकाबले वंदे मातरम को कहीं अधिक पसंद करते हैं। वंदे मातरम का पहला छंद लिखने के बाद, बंकिमचंद्र चटोपाध्याय ने अपने उपन्यास ‘‘आनंदमठ’’ में उसे विस्तार दिया। इस गीत का अधिकांश हिस्सा देवभाषा संस्कृत में है और कुछ पंक्तियां बांग्ला में। इस गीत को ब्रिटिश विरोधी प्रदर्शनों के दौरान गाया जाता था परंतु इसके मूल हिंदू स्वर के बारे में कोई संदेह नहीं होना चाहिए। धर्मनिरपेक्ष आंदोलन से जुड़े एक तबके ने ब्रिटिश विरोधी अभियानों के दौरान इसका इस्तेमाल किया। हिंदुत्ववादी इसे इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि उसका मूल स्वर हिंदू है। साम्प्रदायिक दंगों के दौरान वंदे मातरम के नारे लगाए जाते हैं जिसका प्रतिउत्तर मुसलमानों द्वारा अल्लाहो अकबर का नारा बुलंद कर दिया जाता है। यह गीत हिंदुत्व आंदोलन के लक्ष्यों के इस अर्थ में भी अनुरूप है कि वह राष्ट्र को दुर्गा के रूप में देखता है। भारतीय राष्ट्र की विविधता और उसका बहुवाद, जो कि उसकी मूल पहचान हैं, इस गीत में कहीं दिखलाई नहीं देतीं। जन गण मन, वंदे मातरम और सारे जहां से अच्छा वे तीन राष्ट्रीय गीत थे, जिनमें से एक को राष्ट्रगान बनाया जाना था। जन गण मन, भारत की समृद्ध विविधता को प्रतिबिंबित करता था और अधिकांश राज्यों को स्वीकार्य था। इस कारण उसे राष्ट्रगान के रूप में चुना गया। वंदे मातरम के पहले दो छंदों को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। संघ परिवार इस गीत का उपयोग अल्पसंख्यकों को डराने धमकाने के लिए कर रहा है। यह गीत अपने साम्राज्यवाद-विरोधी संदेश के साथ-साथ अल्पसंख्यक-विरोधी भावनाओं का वाहक भी बन गया है। यही कारण है कि आरएसएस और उसके साथी संगठन, इस गीत पर बहुत जोर दे रहे हैं। यह प्रचार कि जन गण मन जार्ज पंचम की स्तुति में लिखा गया था, गलत इरादे से किया जा रहा है और यह सच पर आधारित नहीं है। यह सांप्रदायिक ताकतों के राजनैतिक एजेंडे का हिस्सा है।

यहां यह महत्वपूर्ण है कि सभी मुसलमानों की वंदे मातरम के बारे में एक राय नहीं है। जानेमाने संगीतकार ए.आर. रहमान ने वंदे मातरम की अत्यंत सुंदर और मनमोहक धुन तैयार की है। शाही इमाम, जिन्होंने इसका विरोध किया था, भाजपा के करीबी रहे हैं और वह पार्टी चुनावों में वोट पाने के लिए उनका इस्तेमाल करती आई है। यहां तक कि पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने फतवा जारी कर मुसलमानों से यह कहा था कि वे भाजपा को वोट दें। पूरे गीत को यदि मुस्लिम नहीं गाना चाहते तो इसे पूरी तरह अनुचित नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसमें कई हिंदू देवी-देवताओं की स्तुति है। परंतु यहां यह बताना समीचीन होगा कि इस गीत के केवल शुरूआती दो छंदों को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया है और इस तथ्य के प्रकाश में, मुसलमानों के लिए भी स्थिति बदल जाती है। हिंदुत्ववादियों के दोहरे मापदंड भी इस विवाद में खुलकर सामने आए हैं। सन् 1998 में, जब उत्तरप्रदेश सरकार ने इस गीत का गायन स्कूलों में अनिवार्य करने का निर्णय लिया था तब अटल बिहारी वाजपेयी ने इसका विरोध किया था।

12 July 2015

भारत भाग्यविधाता?

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कुलदीप कुमार
12 जुलाई, जनसत्ता 

जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार केंद्र में सत्ता में आई है, राष्ट्रीय जीवन के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में फासीवादी हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। अब तो इस बात पर किसी को आश्चर्य भी नहीं होता कि भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद हो या नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट हो या पुणे का फिल्म एवं टेलीविज़न इंस्टीट्यूट, सभी जगह राष्ट्रवादियों को थोपा जा रहा है। सत्ता का चरित्र ही ऐसा है। जो भी सत्ता में आता है, वह बात तो जनता की सेवा करने की करता है---हमारे प्रधानमंत्री भी अपने को जनता का प्रधानसेवक कहलाना अधिक पसंद करते हैं---लेकिन असल में उसका मकसद सत्ता का सुख भोगना और पूरी-हलवा खाना-खिलाना होता है। कांग्रेसी सरकार ने भी इससे अलग आदर्श स्थापित नहीं किया। अगर किया होता तो लोग मोदी सरकार की इन कारगुजारियों को यूं खामोशी से बर्दाश्त न कर लेते। फिल्म इंस्टीट्यूट के छात्र-छात्राएँ अभी युवा हैं, उनका खून अभी ठंडा नहीं हुआ है, इसलिए वे विरोध करने के लिए सड़क पर आए हैं। वरना वे भी औरों की तरह चुप ही रहते।

नियुक्तियों तक तो फिर भी ठीक है। मेरे जैसे आदमी को अब हकीकत का इतना तो ज्ञान हो ही गया है कि जो भी सरकार में आता है, वह मनमानी करता है। अपने लोगों को उपकृत करता है और अपनी नीतियाँ थोपता है। लेकिन भाजपा और उसके नेता जो कर रहे हैं, वह इससे कहीं आगे की चीज है। वह संघ का दूरगामी एजेंडा है जिसको हासिल करने के लिए राजसत्ता केवल एक साधन मात्र है। संघ के कुछेक नेता भले ही सत्ता की फिसलनभरी राह पर रपट जाएँ, पर एक संगठन के रूप में वह अपने रास्ते पर अडिग है। और वह रास्ता भारत को पूरी तरह से एक हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करने की मंजिल की तरफ जाता है। संघ भारत को पाकिस्तान का प्रतिबिंब बना देना चाहता है। यह मेरा मौलिक चिंतन नहीं है। अनेक लोग इसके बारे में लिख-बोल चुके हैं।

यह संयोग नहीं है कि जब भी भाजपा सत्ता में आती है, उसके कुछ बड़े नेता राष्ट्रीय नायकों के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर देते हैं। उनके अपने संघ परिवार में कोई भी राष्ट्र नायक नहीं है, क्योंकि संघ की दृढ़ मान्यता थी कि अंग्रेज़ शासकों से लड़ने के बजाए हिन्दू समाज को संगठित करना अधिक आवश्यक है ताकि मुस्लिम आक्रांताओं को मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके। यह हमारे देश में ही संभव है कि आजादी की लड़ाई में भाग न लेने वाले यह दावा करें कि सबसे बड़े देशभक्त वे ही हैं। यही नहीं, जिन महापुरुषों ने इस लड़ाई का नेतृत्व किया, उन पर  बिना किसी संकोच के कीचड़ उछाली जाए और उनका चरित्रहनन किया जाए। वह भी एक ऐसे संगठन के द्वारा जिसका दावा है कि वह अपनी शाखाओं में चरित्र निर्माण पर सबसे अधिक ज़ोर देता है।

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जब कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने यह मौलिक विचार प्रकट किया था कि भारतवर्ष इतना प्राचीन देश है, फिर महात्मा गांधी को हम राष्ट्रपिता कैसे कह सकते हैं? वे तो असल में राष्ट्रपुत्र थे, भारतमाता की संतान थे। जब यह पता चला कि गांधी को सबसे पहले राष्ट्रपिता नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था-- वह भी तब जब वे गांधी के विरोध के कारण कई साल पहले कांग्रेस छोड़ कर अलग पार्टी बना चुके थे और जर्मनी एवं जापान के समर्थन से आजाद हिन्द फौज बना कर ब्रिटिश सेना से युद्ध के मैदान में लोहा ले रहे थे—तो कल्याण सिंह समेत अन्य संघियों की बोलती बंद हो गई क्योंकि जिस तरह इन दिनों वे सरदार वल्लभभाई पटेल और बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर को अपनी गिरफ्त में ले रहे हैं, उसी तरह वे दशकों पहले नेताजी को अपने नायकों की पंक्ति में जगह दे चुके थे। बिना किसी शर्म-लिहाज के, क्योंकि नेताजी विचारों से पक्के धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए किसी भी साधन का इस्तेमाल करने के लिए तत्पर थे, जबकि संघ ने हमेशा अपने को इस लड़ाई से दूर रखा।

नरेंद्र मोदी भले ही महात्मा गांधी के चित्र पर फूल चढ़ाएँ, और संघ भले ही दिखावे के लिए उनका नाम अपने प्रातःस्मरणीय महापुरुषों की सूची में शामिल कर ले, लेकिन असलियत यह है कि जब तक गांधी जनमानस में जिंदा और समादृत हैं, तब तक संघ को अस्थाई सफलता ही मिल सकती है। स्थायी रूप से वह अपनी विचारधारा को जनता के मन में स्थापित नहीं कर सकता। यही बात जवाहरलाल नेहरू और अंबेडकर के बारे में लागू होती है। इसलिए बाहर से अनेक तरह का दिखावा करने के बावजूद संघ और उसके कार्यकर्ताओं का हमेशा प्रयास रहेगा कि इन महापुरुषों की छवि पर कालिख पोती जाये।

अब कल्याण सिंह को इल्हाम हुआ है कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का गीत जन गण मन अधिनायक जय हे, जो भारत का राष्ट्रगान है, दरअसल ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम की स्तुति में लिखा गया  था। फिर वह स्वाधीन भारत का राष्ट्रगान कैसे हो सकता है? कल्याण सिंह तो संघ की शाखा से निकले हैं। उनके इस बयान पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता। आश्चर्य होता है सुप्रीम कोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश जस्टिस मार्कन्डेय काटजू पर जिन्होंने अपने ब्लॉग में रवीन्द्रनाथ ठाकुर को अंग्रेज शासकों का टहलुआ कहकर गाली दी है और एक विलक्षण खोज की है कि 1937 में जब उन्हें अपने-आपको देशभक्त सिद्ध करना था, तब उन्होंने यह स्पष्टीकरण दिया कि यह गीत तो उन्होंने भारतवर्ष के भाग्यविधाता यानि ईश्वर के लिए लिखा था। आश्चर्य इस बात पर भी होता है कि कैसे अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में भूमिका निभाने वाले कैलाशनाथ काटजू के परिवार को कोई सदस्य इस प्रकार की जाहिलाना बात कह सकता है, और कैसे इतने अपढ़ किस्म के लोग सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच सकते हैं? कोई जस्टिस काटजू से पूछे कि जब 1919  में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जलियाँवाला बाग के नरसंहार का विरोध करते हुए ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई सर की उपाधि वापस की थी, तब क्या वे उस सरकार के टहलुए की भूमिका अदा कर रहे थे? उन्हें 1937 में जाकर खुद को देशभक्त सिद्ध करने की जरूरत पड़ी? क्या तब तक उन्हें देशभक्त नहीं माना जाता था? ये वही काटजू साहब हैं जिनकी राय में देश के अधिकांश पत्रकार अनपढ़ हैं !

सव्यसाची भट्टाचार्य समेत अनेक शीर्षस्थ इतिहासकार इस प्रकरण के बारे में तथ्य प्रस्तुत कर चुके हैं। शायद कल्याण सिंह और मार्कन्डेय काटजू जैसे देशभक्त अंग्रेजी पढ़ना पसंद न करते हों। लेकिन यदि वे हिन्दी के शीर्षस्थ विद्वान, अद्भुत उपन्यासकार और भारतीय संस्कृति के अप्रतिम व्याख्याता आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का इस विषय पर लेख पढ़ लेते, तो उनके दिमाग के कुछ जाले तो जरूर साफ हो जाते। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक भाषा साहित्य और देश में आचार्य द्विवेदी का वह लेख संकलित है जो उन्होंने देश को आजादी मिलने के कुछ ही समय बाद लिखा था। उस समय तक संविधान सभा ने यह तय नहीं किया था कि वंदे मातरम राष्ट्रगान होगा या जन गण मनयहाँ याद दिला दूँ कि उन्हें स्वयं रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शांतिनिकेतन में हिन्दी भवन की स्थापना के लिए आमंत्रित किया था और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में आने से पहले उन्होंने लंबे समय तक रवीन्द्रनाथ के सान्निध्य में रह कर शांतिनिकेतन में पढ़ाया था। इस लेख में आचार्य द्विवेदी ने लिखा है: रवीन्द्र-साहित्य का साधारण विद्यार्थी भी जानता है कि रवीन्द्रनाथ राजा या राजराजेश्वर किसे कहते हैं। साधारण जनता जिसे ईश्वर या भगवान कहती है उसी को रवीन्द्रनाथ ने राजा, राजेन्द्र, राजराजेश्वर आदि कहा है। उनकेराजा’, ‘डाकघर’, ‘अरूपतनआदि नाटकों में यही राजा अदृश्य पात्र होता है। एक शक्ति कविता में उन्होने इसीराजेन्द्रको सीमाहीन काल का नियन्ता कहा है।28 दिसंबर, 1911 के अंग्रेजी समाचारपत्र बंगाली में प्रकाशित रिपोर्ट से भी स्पष्ट है कि कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ का देशभक्तिपूर्ण गीत गाया गया था और उसके बाद ब्रिटिश सम्राट के प्रति राजभक्ति प्रकट करने वाला एक हिन्दी गीत गाया गया। काटजू साहब और कल्याण सिंह क्या बताएँगे कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने हिन्दी गीत कब लिखे?


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जन गण मन अधिनायक जय हे

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आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

देश का राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम’ गान हो या ‘जनगणमन अधिनायक’, इस प्रश्न पर आज-कल बहुत वाद-विवाद हो रहा है। भारतीय विधान-सभा शीघ्र ही इस बात पर भी विचार करेगी। दोनों गानों के पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ कहा गया है। मुझे इन बातों पर यहाँ विचार करना अभीष्ट नहीं हैं। प्रन्तु इधर हाल ही में कुछ लोगों ने यह बात उड़ा दी है कि यह ‘जनगण’ वाला गान कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सम्राट जार्ज पंचम की स्तुति में लिखा था और वह पहले पहल सन १९१२ ई० के दिल्ली दरबार में गाया गया था। इस सम्बन्ध में मेरे पास अनेक सज्जनों ने पूछताछ की है। भारत का राष्ट्रगीत चाहे जो भी स्वीकार कर लिया जाय, वह हम लोगों के लिए पूजनीय और वन्दनीय होगा, पर किसी असत्य बात का प्रचार करना अनुचित है। मैंने विश्व भारती संसद (गवर्निंग बॉडी) के सदस्य की हैसियत से अन्य अनेक मित्रों के साथ एक वक्तव्य ३० नवम्बर, १९४८ को दिया था। परन्तु उस वक्तव्य के प्रकाशित होने के बाद भी पत्र आते रहे। इसलिए एक बार फिर मैं साधारण जनता के चित्त से इस भ्रान्त धारणा को दूर करने के उदेश्य से यह वक्तव्य प्रकाशित करा रहा हूँ।

कुछ दिनों पहले तक इस प्रकार के अपप्रचार का क्षेत्र बंगाल तक ही सीमित रहा है। कवि की जीवितावस्था में ही इस प्रकार की कानाफूसी चलने लगी थी। किसी किसी ने उनसे पत्र लिखकर यह जानने का प्रयत्न भी किया था कि इस कानाफूसी में कुछ तथ्य है या बिलकुल निराधार है। कवि ने बड़ी व्यथा के साथ सुधारानी देवी को अपने २३ मार्च,१९३९ के पत्र में लिखा था कि “मैंने चतुर्थ या पंचम जार्ज को ‘मानव इतिहास के युग-युग धावित पथिकों के रथयात्रा का चिरसारथी’ कहा है, इस प्रकार की अपरिमित मूढ़ता का सन्देह जो लोग मेरे विषय में कर सकते हैं, उनके प्रश्नों का उत्तर देना आत्मावमानना है।”

रवीन्द्र-साहित्य का साधारण विद्यार्थी भी जानता है कि रवीन्द्रनाथ राजा या राजराजेश्वर किसे कहते हैं। साधारण जनता जिसे ईश्वर या भगवान कहती है उसी को रवीन्द्रनाथ ने राजा, राजेन्द्र, राजराजेश्वर आदि कहा है। उनके ‘राजा’, ‘डाकघर’, ‘अरूपतन’ आदि नाटकों में यही राजा अदृश्य पात्र होता है। एक शक्ति कविता में उन्होने इसी ‘राजेन्द्र’ को सीमाहीन काल का नियन्ता कहा है। एक गान में उन्होने लिखा है कि तेरे स्वामी ने तुझे जो कौड़ी दी है उसे ही तू हँश कर ले ले, हजार-हजार खिंचावों में पड़ा मारा-मारा न फिर। ऐसा हो कि तेरा हृदय जाने कि तेरे राजा हृदय में ही विद्यमान हैं।

जे कड़ि तोर स्वामीर देवा सेइ कड़ि तुइनिस रे हेसे।
लोकेर कथा जिसने काने फिरिसने आट हजार टाने।
जेन रे तोर हृदय जाने हृदय तोर आद्येन राजा॥

जो लोग सरल भाव से विश्वास कर सकते हैं कि रवीन्द्रनाथ ने राजेश्वर कहकर किसी पंचमजार्ज की स्तुति की है, वे यदि गान की पँक्तियों पर थोड़ा भी विचार करते तो उन्हे अपना भ्रम स्पष्ट हो जाता। कैसे कोई किसी पंचम या षष्ठ जार्ज को—

“विकट पन्थ उत्थान पतन मय युग युग धावित यात्री
हे चिर सारथि तव रथचक्रे मिखरित पथ दिन रात्री
दारुण विप्लव माँझे, तब शंखध्वनि बाजे
संकट दुख परित्राता” (हिन्दी अनुवाद से)

कह सकता है? फिर कोई पंचम या अपंचम जार्ज को किस प्रकार—

"घोर अन्धतम विकल निशा भयमूर्छित देश जनों में
जागृत था तव अविचल मंगल नत अनिमिष नयनों में
दुःस्वप्ने आतंके आश्रय तव मृदु अंके,
स्नेहमयी तुम माता।”

कहकर उसे जनगण संकट त्राटक कह सकता है? और रवीन्द्रनाथ जैसे मनस्वी कवि से जो लोग आशा करते हैं कि किसी नरपति को वह इतना सम्मान देगा कि सम्पूर्ण भारत उसके चरणों में ‘नतमाथ’ होगा, उसे क्या कहा जाय!

वस्तुतः यह गाना दिल्ली दरबार में नहीं बल्कि सन १९११ ई० में हुए कांग्रेस के कलकत्ते वाले अधिवेशन में गाया गया था। सन १९१४ ई० में जॉन मुरे ने ‘दि हिस्टारिकल रेकार्ड ऑफ़ इम्पीरियल विज़िट टु इण्डिया, १९११’ नाम से दिल्ली दरबार का एक अत्यन्त विशद विवरण प्रकाशित किया था। उसमें इस गान की कहीं चर्चा नहीं है। सन १९१४ में रवीन्द्रनाथ की कीर्ति समूचे विश्व में फैल गई थी। अगर यह गान दिल्ली दरबार में गाया गया होता तो अंग्रेज प्रकाशक ने अवश्य उसका उल्लेख किया होता, क्योंकि इस पुस्तिका का प्रधान उद्देश्य प्रचार ही था।

असल में १९११ के कांग्रेस के मॉडरेट नेता चाहते थे कि सम्राट दम्पती की विरुदावली कांग्रेस मंच से उच्चारित हो। उन्होने इस आशय की रवीन्द्रनाथ से प्रार्थना भी की थी, पर उन्होने अस्वीकार कर दिया था। कांग्रेस का अधिवेशन ‘जनगणमन’ गान से हुआ और बाद में सम्राट दम्पती के स्वागत का प्रस्ताव पारित हुआ। प्रस्ताव पास हो जाने के बाद एक हिन्दी गान बंगाली बालक बालिकाओं ने गाया था, यही गान सम्राट की स्तुति में था। सन १९११ के २८ दिसम्बर के ‘बंगाली’ में कांग्रेस अधिवेशन की रिपोर्ट इस प्रकार छपी थी—

The proceedings commnenced witha patriotic song composed by Babu Rabindranath Tagore, the leading poet of Bengal (Janaganamana..) of which we give the English translation (यहाँ अँग्रेज़ी में इस गान का अनुवाद दिया गया था) Then after passing of the loyalty resolution, a Hindi song paying heartfelt homage to their imperial majesties was sung by Bengali boys and girls in chorus.

विदेशी रिपोर्टरों ने दोनों गानों को गलती से रवीन्द्रनाथ लिखित समझ कर उसी तरह की रिपोर्ट छापी थी। इन्ही रिपोर्टों से आज यह भ्रम चल पड़ा है।

मैं स्पष्ट रूप से बता दूँ कि मैं वन्दे मातरम गान का कम भक्त या प्रशंसक नहीं हूँ। यह वक्तव्य इस उद्देश्य से दिया गया है कि असत्य बात प्रचारित न हो और इस महान कवि के सिर व्यर्थ का ऐसा दोषारोप न किया जाय जिसने भारतवर्ष की संस्कृति को सम्पूर्ण जगत में प्रतिष्ठा दिलाई। रवीन्द्र मनस्वी कवि थे, वे कभी किसी विदेशी नरपति की स्तुति में इतना मनोहर गान लिख ही नहीं सकते थे।

(भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित 'भाषा साहित्य और देश' में संकलित तथा nirmal-anand.blogspot.in से साभार)


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रवींद्र नाथ टैगोर के 'अधिनायक' के मायने
एम राजीवलोचन
प्रोफ़ेसर (इतिहास), पंजाब विश्वविद्यालय
8 जुलाई 2015, बीबीसी हिंदी

राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने भारत के राष्ट्र गान 'जन गण मन' पर सवाल उठाकर एक नई बहस को हवा दे दी है. कल्याण सिंह ने हाल में राजस्थान विश्वविद्यालय के 26वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए पूछा था कि 'जन गण मन अधिनायक जय हो' में अधिनायक किसके लिए है. उन्होंने कहा था कि यह ब्रिटिश समय के अंग्रेज़ी शासक का गुणगान है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रगान में संशोधन होना चाहिए. अब जरा, एक नज़र इस गाने के इतिहास पर भी डाल लेते हैं.

गद्दारी का गाना?
यही वह गाना था जिसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज के लड़ाकों ने राष्ट्रगान के तौर पर अपनाया था. स्वतंत्रता से पहले 1937 में प्रांतों में पहली चुनी हुई सरकारों ने भी इसे अपनाया. स्वतंत्र भारत के गणराज्य ने काफी चिंतन-मनन के बाद इसे 1950 में अपनाया. 2004 में साध्वी ऋतंभरा ने भी 'जन गण मन अधिनायक जय हे' को ‘गद्दारी का गाना’ का दर्जा दे डाला था.

यह गाना पहली बार 27 दिसंबर 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के दूसरे दिन का काम शुरू होने से पहले गाया गया था. 'अमृत बाज़ार पत्रिका' में यह बात साफ़ तरीके से अगले दिन छापी गई. पत्रिका में कहा गया कि कांग्रेसी जलसे में दिन की शुरुआत गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर द्वारा रचित एक प्रार्थना से की गई. 'बंगाली' नामक अखबार में खबर आई कि दिन की शुरुआत गुरुदेव द्वारा रचित एक देशभक्ति के गीत से हुई. टैगोर का यह गाना संस्कृतनिष्ठ बंग-भाषा में था यह बात बॉम्बे क्रॉनिकल नामक अखबार में भी छपी.

शासक का गुणगान!
यही वह साल था जब अंग्रेज सम्राट जॉर्ज पंचम अपनी पत्नी के साथ भारत के दौरे पर आए हुए थे. तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग्स के कहने पर जॉर्ज पंचम ने बंगाल के विभाजन को निरस्त कर दिया था और उड़ीसा को एक अलग राज्य का दर्जा दे दिया था. इसके लिए कांग्रेस के जलसे में जॉर्ज की प्रशंसा भी की गई और उन्हें धन्यवाद भी दिया गया.

'जन गण मन' के बाद जॉर्ज पंचम की प्रशंसा में भी एक गाना गाया था. यह दूसरा गाना रामभुज चौधरी द्वारा रचा गया था, सम्राट के आगमन के लिए. यह हिंदी में था और इसे बच्चों ने गाया: बोल थे, ‘बादशाह हमारा’. कुछ अखबारों ने इसके बारे में भी खबर दी. शायद आप रामभुज के बारे में न जानते हों. उस वक्त भी लोग कम ही जानते थे. दूसरी ओर, टैगोर जाने-माने कवि और साहित्यकार थे. सो सत्ता-समर्थक अख़बारों ने खबर कुछ इस तरह दी कि जिससे लगा कि सम्राट की प्रशंसा में जो गीत गाया गया था वह टैगोर ने लिखा था. तबसे लेकर आज तक, यह विवाद चला आ रहा है कि कहीं गुरुदेव ने यह गाना अंग्रेज़ों की प्रशंसा में तो नहीं लिखा था?

टैगोर की सफ़ाई
इस गाने के बारे में इसके रचियता टैगोर ने 1912 में ही स्पष्ट कर दिया कि गाने में वर्णित भारत भाग्य विधाता के केवल दो ही मतलब हो सकते हैं: देश की जनता, या फिर सर्वशक्तिमान ऊपर वाला—चाहे उसे भगवान कहें, चाहे देव. टैगोर ने इसे खारिज़ करते हुए साल 1939 में एक पत्र लिखा, ''मैं उन लोगों को जवाब देना अपनी बेइज्जती समझूँगा जो मुझे इस मूर्खता के लायक समझते हैं.''

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इस गाने की बड़ी खासियत यह थी कि यह उस वक़्त व्याप्त आक्रामक राष्ट्रवादिता से परे था. इसमें राष्ट्र के नाम पर दूसरों को मारने-काटने की बातें नहीं थीं. गुरुदेव ने इसी दौरान एक छोटी सी पुस्तक भी प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक था ‘नेशनलिज़्म’. यहाँ उन्होंने अपने गीत 'जन गण मन अधिनायक जय हे' की तर्ज पर यह समझाया कि सच्चा राष्ट्रवादी वही हो सकता है तो दूसरों के प्रति आक्रामक न हो. आने वाले सालों में 'जन गण मन अधिनायक जय हे' ने एक भजन का रूप ले लिया. कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशनों की शुरुआत इसी गाने से की जाने लगी. 1917 में टैगोर ने इसे धुन में बंधा. धुन इतनी प्यारी और आसान थी कि जल्द ही लोगों के मानस पर छा गई.

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