28 December 2016

ब्रिटिश राज: हिंदी डाक्यूमेंट्री

आज से 131 साल पहले मुंबई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुयी थी. शुरुआत में ब्रिटिश राज के प्रति वफादारी जताने की रणनीति से लेकर नरम दल और गरम दल के दौर से गुजरकर यही संगठन गाँधीजी के नेतृत्व में भारत की आज़ादी का मंच बना. हिंदी डाक्यूमेंट्री द्वारा उस समय के विडियो फुटेज लेकर बनायी गयी यह कलर्ड डाक्यूमेंट्री आपको उस रोमांचक दौर में पहुंचा देगी, जिसका हिस्सा होने की हम सबमें हसरत है. आज स्वाधीन आपके लिए यह डाक्यूमेंट्री लेकर आया है.


(साभार: यूट्यूब)

18 December 2016

अशफाक़ के राम

सौरभ बाजपेयी 

यह लेख अशफाक उल्ला खाँ के बारे में नहीं है. न ही रामप्रसाद बिस्मिल के बारे में है. यह आज़ादी के दो परवानों के आपसी रिश्तों का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है. आज से तकरीबन 90 साल पहले 19 दिसंबर 1927 को इन दोनों क्रांतिकारियों ने रोशन सिंह के साथ हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चूमा था. चार क्रान्तिकारी जिन्हें फाँसी की सजा सुनायी गयी थी उनमें राजेंद्र लाहिरी को 2 दिन पहले ही फाँसी पर चढ़ा दिया गया था. उसकी वजह सबको पता हैं और उन्हें यहाँ दोहराने की कोई मंशा नहीं है. यहाँ तो गर्मजोशी से भरे एक अटूट रिश्ते की बात होनी है. क्योंकि आज के झूठ और अफवाह भरे दौर में इस रिश्ते की बात करना बेहद जरूरी है.

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काकोरी काण्ड में फाँसी का फंदा चूमने वाले राजेन्द्र लाहिरी, अशफाक उला खाँ, रामप्रसाद बिस्मिल और रोशन सिंह 

जो लोग आज आज़ादी की लड़ाई से जुड़े प्रतीकों पर जमीनी काम कर रहे हैं उन्हें पता है कि ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है कि जिनके राजनीतिक पुरखों ने आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया था, वो शहीदों के दामन पर कीचड़ उछालकर समूची विरासत को कठघरे में खड़ा कर देना चाहते हैं. इसका शिकार सिर्फ़ गाँधी- नेहरु नहीं हैं, अभी छोटे स्तर पर ही सही लेकिन क्रान्तिकारी आन्दोलन के खिलाफ भी एक बड़ी साजिश चल रही है. यह सिद्ध करने की कोशिश है कि स्वतंत्रता संघर्ष के सभी नायक आपस में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास, प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या की भावना से भरे हुए थे.

मेरे अजीज़ मित्र शाह आलम क्रान्तिकारी आन्दोलन के इनसाइक्लोपीडिया हैं. पिछले दिनों वे उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले में बिस्मिल जयंती के मौके पर आयोजित कार्यक्रमों में शिरकत करने गए. उन्होंने वहाँ देखा कि बिस्मिल की याद में हो रहे कार्यक्रमों में आरएसएस के लोग वक्ता के तौर पर आमंत्रित हैं. जिनके लोगों ने क्रांतिकारियों की मुखबिरी की, माफीनामे लिखे— वे बिस्मिल को श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे. लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात थी कि उन्होनें बिस्मिल के खिलाफ अशफाक को खड़ा कर दिया. उन्होनें कहा कि बिस्मिल को फाँसी न होती अगर अशफाक उल्ला खाँ ने उनकी मुखबिरी न कर दी होती. अशफाक की गवाही और शिनाख्त पर ही बिस्मिल गिरफ्तार हो गए वरना वो पुलिस के हाथ कभी न आते. यह बात शाह आलम ने कार्यक्रम के बीच से ही फ़ोन करके बतायी.

यह एक खतरनाक योजना है. जिसमें एक तरफ़ आज़ादी की लड़ाई के इतिहास को तोड़-मरोड़कर लोगों की उसके प्रति श्रद्धा ख़त्म करने की साजिश है तो दूसरी तरफ़ हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच आपसी फूट पैदा करने की कोशिश भी. आधुनिक भारतीय इतिहास को नए सिरे से लिखने के संघी उत्साह के पीछे यही दो उद्देश्य हैं. आज़ादी की लड़ाई से गद्दारी करने वाले लोगों के लिए इस इतिहास को लोगों की स्मृति से मिटाकर साफ़ कर देने के अलावा चारा ही क्या है? फिर “मुसलमान कभी भी वफादार नहीं हो सकते” की संघी धारणा को पुख्ता करने के लिए यह और ऐसे तमाम झूठ काफी कारगर सिद्ध हो सकते हैं. अगर अशफाक बिस्मिल को धोखा दे सकते हैं तो भला कौन मुसलमान है जिस पर भरोसा किया जा सकता है. ख़ास बात यह है कि इस झूठ का कोई ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद नहीं है. यहाँ तक कि लोकस्मृति में भी यह बात कभी सुनने में नहीं आयी. इसलिए तय है कि यह संघ की अपनी झूठ फैक्ट्री का नायाब उत्पाद है जिसे छोटे-छोटे मंचों के सहारे लोगों के दिमाग में उतारा जा रहा है.

रामप्रसाद बिस्मिल अपनी आत्मकथा में अशफाक के बारे में एक किस्सा सुनाते हैं. एक बार अशफाक को हार्ट अटैक का दौरा पड़ा. बेहोशी की हालत में वो राम-राम कराह रहे थे. आर्य समाजी बिस्मिल के साथ रहने के कारण घर-परिवार और आस-पड़ोस के लोगों को लगा कि अशफाक ने कहीं धर्मांतरण तो नहीं कर लिया. सब उन्हें टोकने लगे कि अल्लाह-अल्लाह कहो लेकिन अशफाक राम-राम रटते रहे. तभी एक क्रान्तिकारी साथी वहाँ आये और उन्होंने राज खोला. अशफाक बिस्मिल रामप्रसाद को राम कहकर पुकारते थे. तब रामप्रसाद बिस्मिल को बुलाया गया और अशफाक को चैन मिला. जो इंसान बेहोशी की हालत में भी अपने क्रान्तिकारी नेता का नाम ले रहा हो, उसकी शहादत के बाद उस पर इतना गन्दा इल्जाम सुनकर हम सबको शर्म से झुक जाना चाहिए. अशफाक के बारे में लिखते समय बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में एक शेर लिखा है— “असगर(१) हरीम(२) इश्क में हस्ती ही जुर्म है/ रखना कभी न पाँव यहाँ सर लिए हुए”. वो दीवाने अपने सर तो कटा गए लेकिन उन्हें इस बात का तनिक भान न था कि आने वाली पीढ़ियों के कुछ सिरफिरे उन्हें गद्दार ठहराएंगे. बहुत कोफ़्त है, अफ़सोस है. आप भी काकोरी काण्ड के अभियोग में फाँसी का फंदा चूमने वाले इन शहीदों की शहादत के दिन अफ़सोस मनाइए. अफ़सोस इसका नहीं कि वो शहीद हुए, अफ़सोस इसका कि हम और आप उनकी शहादत को सहेजकर न रख सके.   

१ असगर- शायर का तखल्लुस 
२ हरीम- मस्जिद 

(लेखक राष्ट्रीय आन्दोलन फ्रंट के संयोजक हैं.)

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